आज सुबह की धूप कुछ अलग थी—खिड़की से आती सुनहरी किरणें रसोई की दीवार पर नाच रही थीं। मैंने सोचा कि आज कुछ पुराना बनाऊं, कुछ जो नानी बनाया करती थीं। गट्टे की सब्जी का ख्याल आया और मन में एक मीठी सी खुशी दौड़ गई।
बेसन को छानते समय उसकी महीन बारिश देखकर मुझे बचपन की वह दोपहर याद आई जब नानी ने पहली बार मुझे गट्टे बनाना सिखाया था। उनके हाथों की वह कुशलता, जिससे वे आटे को गूंथती थीं, मैं आज भी नहीं पकड़ पाई हूं। आज मैंने थोड़ा ज्यादा पानी डाल दिया और गूंदते समय समझ आया कि बेसन का आटा गेहूं के आटे जितना माफ नहीं करता—हर बूंद का हिसाब रखना पड़ता है।
गट्टे उबालते समय रसोई में वही खुशबू फैली जो नानी के घर में होती थी—धनिया, जीरा, और हल्दी का मिला-जुला सुगंध। मैंने एक गट्टे को काटकर देखा—अंदर से मुलायम, बाहर से हल्का सा सख्त। बिल्कुल वैसा जैसा होना चाहिए। दही की कढ़ी में जब इन्हें डाला, तो वे तैरने लगे जैसे छोटी-छोटी नावें।