आज सुबह सब्जी मंडी में जो तरोताज़ा बैंगन मिला, वो देखकर मन ही मन मुस्कुरा दी। गहरे बैंगनी रंग की चमकदार छाल, और छूने पर एकदम मुलायम। सोचा, आज भरवां बैंगन ही बनाना है – माँ की रेसिपी, जिसमें मूंगफली, तिल, और गुड़ का मसाला होता है। घर आकर बैंगनों को धोकर उनमें चीरे लगाए, तो उनकी हल्की कच्ची खुशबू ने रसोई को महका दिया।
मसाला तैयार करते वक़्त एक छोटी गलती हुई – गुड़ थोड़ा ज़्यादा पड़ गया, जिसकी वजह से मिठास उम्मीद से ज़्यादा आ गई। लेकिन पहला निवाला मुँह में रखते ही लगा कि ये गलती वरदान बन गई। मीठा और तीखा एक साथ – एकदम खट्टा-मीठा अचार जैसा नहीं, बल्कि उससे कुछ नरम, कुछ और गहरा। बैंगन की नर्म परतें जो कड़ाही में धीमी आँच पर सिकी थीं, हर कटोरी मसाले को अपने में सोख रही थीं।
मुझे अचानक याद आई वो शाम जब माँ ने पहली बार ये बनवाया था – मैं दस साल की रही होऊँगी। उनकी आवाज़ अब भी सुनाई देती है: "बैंगन को दबाना मत, प्यार से पलटाना।" तब मैंने ज़ोर से पलटा था और दो बैंगन बिखर गए थे। आज भी वो सिखावन काम आई, हर टुकड़ा साबुत निकला, और परोसते वक़्त रंगत भी खूबसूरत लग रही थी।