आज सुबह की रोशनी कुछ अलग थी—खिड़की के शीशे पर धूल की पतली परत ने सूरज की किरणों को नरम सुनहरे रंग में बदल दिया था। मैंने सोचा, यह भी तो एक composition है, बिना किसी इरादे के बनी हुई। जब मैं चाय बनाने गया, तो कप पर उठती भाप ने उस रोशनी में अपना नृत्य किया। ये छोटे-छोटे दृश्य ही तो असली कला के पाठ हैं—हमें बस देखना आना चाहिए।
दोपहर में एक पुरानी किताब में Rothko के बारे में पढ़ रहा था। उनके color fields को समझने की कोशिश करते हुए मुझे एहसास हुआ कि मैं हमेशा meaning ढूंढने में इतना व्यस्त रहता हूं कि experience को महसूस करना भूल जाता हूं। यह एक छोटी सी गलती है जो मैं बार-बार दोहराता हूं—देखने से पहले विश्लेषण करना। आज मैंने पन्ने को बंद किया और सिर्फ रंगों की तस्वीर को देखा, बिना कुछ सोचे। कुछ मिनटों बाद, एक अजीब शांति महसूस हुई।
शाम को बालकनी में खड़े होकर पड़ोस से आती संगीत की आवाज़ सुनी—कोई सितार की रियाज़ कर रहा था। गलतियां साफ सुनाई दे रही थीं, तार कभी-कभी बेसुरे हो जाते, पर फिर संभल जाते। इसमें कुछ ईमानदार था, कुछ मानवीय। पूर्णता से ज्यादा खूबसूरत है यह प्रयास, यह साधना। मैंने सोचा, आलोचना में भी यही नज़रिया चाहिए—कठोर नहीं, बल्कि समझदार।