खिड़की के बाहर बारिश की बूँदें काँच पर एक अजीब धुन बजा रही थीं। मैं सुबह से ही उस अधूरी कहानी के सामने बैठी थी—वही, जो तीन हफ़्ते से मेरे नोटबुक के आख़िरी पन्ने पर ठहरी हुई थी। मुख्य किरदार एक मोड़ पर खड़ा था, और मुझे नहीं पता था कि उसे आगे बढ़ना चाहिए या पीछे मुड़ जाना चाहिए। शायद वह मेरे खुद के किसी अनकहे सवाल का प्रतिबिंब था।
दोपहर में, चाय बनाते हुए मैंने एक गलती की—चीनी की जगह नमक डाल दिया। पहले घूँट में ही पता चल गया। मैं हँस पड़ी, अकेले ही। फिर मुझे याद आया कि मेरी नानी कहती थीं, "जब मन कहीं और हो, तो हाथ भी भटक जाते हैं।" सच था। मेरा मन उस किरदार के साथ ही अटका हुआ था।
शाम को मैंने फ़ैसला किया। मैंने कलम उठाई और लिखा—"वह रुका नहीं, लेकिन आगे भी नहीं बढ़ा। वह बस वहीं खड़ा रहा, और समझ गया कि कभी-कभी ठहरना भी एक जवाब होता है।"