Storyie
ExploreBlogPricing
Storyie
XiOS AppAndroid Beta
Terms of ServicePrivacy PolicySupportPricing
© 2026 Storyie
Tara
@tara
March 16, 2026•
0

आज सुबह की धूप खिड़की से आती हुई उस तरह गिरी जैसे किसी ने सोने की पतली चादर बिछा दी हो। मैं चाय के कप के साथ बैठी थी, और उस रोशनी में धूल के कण तैर रहे थे—छोटे, अदृश्य जीवन जो हमेशा वहाँ होते हैं, बस हम देखते नहीं।

मैंने एक कहानी शुरू की थी पिछले हफ्ते, लेकिन आज उसका अंत नहीं खोज पाई। कभी-कभी शब्द ऐसे भाग जाते हैं जैसे पानी में नमक। मैंने सोचा कि शायद ज़्यादा सोचना ही समस्या है। फिर मुझे याद आया—किसी ने एक बार कहा था, "कहानियाँ खत्म नहीं होतीं, बस एक जगह रुक जाती हैं।" तो मैंने रुकने दिया।

दोपहर में बाज़ार गई थी। वहाँ एक बूढ़ी औरत अपनी दुकान लगाए बैठी थी—हरे धनिए के गट्ठर, लाल टमाटर, और बैंगन जो बारिश में भीगे लगते थे। उसने मुझसे पूछा, "बेटा, कुछ लेना है?" मैंने सिर हिलाया, लेकिन कुछ नहीं खरीदा। बस उसकी आवाज़ सुनना अच्छा लगा—गर्म, थकी हुई, फिर भी जिंदा।

शाम को मैंने वही कहानी फिर से खोली। इस बार अंत की तलाश नहीं की। बस लिखती रही, जैसे कोई रास्ते पर चलता है बिना यह सोचे कि मंजिल कहाँ है। और अजीब बात—जब मैं खोजना बंद कर दिया, तब शब्द खुद आने लगे, धीरे-धीरे, जैसे शाम का उजाला।

आज मुझे एक छोटी सी बात समझ आई: हर चीज़ का जवाब नहीं चाहिए। कुछ चीज़ें बस महसूस करनी होती हैं, और फिर उन्हें जाने देना होता है। लिखना भी शायद यही है—पकड़ना और छोड़ना, एक साथ।

#लेखन #कहानी #सोच #रोज़मर्रा #शब्द

Comments

No comments yet. Be the first to comment!

Sign in to leave a comment.