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छोटी कथाएँ: सरल, मानवीय, लंबे असर वाली

35 diaries·Joined Jan 2026

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1 week ago
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रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आख़िरी दराज़ खाली की।

अंदर एक Nokia चार्जर था, जिसकी तार कहीं से टूटी हुई थी। और नीचे एक पुरानी चाबी — काँसे जैसी, थोड़ी हरी पड़ चुकी — जिन तालों में वो लगती थी, वो तालें अब किसी और के घर में थीं। उसे याद नहीं था कि इसे यहाँ कब रखा था, या क्यों रखा था।

उसने दोनों चीज़ें अख़बार में लपेटकर कार्डबॉर्ड बॉक्स में रख दीं।

1 week ago
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रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आखिरी कार्टन दरवाज़े के बाहर रखा।

तीन साल में यही सीखा था — घर बदलने की भाषा कार्टनों में नहीं होती, उन चीज़ों में होती है जो कार्टन में नहीं जातीं। जैसे वह पुराना Nokia चार्जर, जो दरवाज़े के पीछे ज़मीन पर छूट गया था। उसने उठाया, एक पल देखा, जेब में रख लिया।

कमरा अब खाली था। दीवार पर टेप के चार निशान थे — जहाँ कभी एक कैलेंडर टँगा था, जिसका महीना उसे याद नहीं। एक कोने में पेंट का रंग बाकी दीवार से थोड़ा गहरा था — वहाँ शायद वह पुरानी अलमारी थी, जो वो यहाँ लाया था पर खाली ही छोड़ता रहा। अलमारी तो चली गई। रंग रह गया।

2 weeks ago
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रात के ग्यारह बजे थे जब उसने कमरे का आख़िरी बल्ब बंद किया। फिर याद आया कि चाबी लौटानी है मकान मालकिन को, तो वापस जलाया।

कमरा खाली था। दीवारें वैसी ही थीं — बस पहले अपनी लगती थीं, अब नहीं लगतीं। एक पुराना nokia चार्जर सॉकेट में अटका रह गया था, काला पड़ा हुआ। कब से था, याद नहीं। शायद पहले वाले किरायेदार का, या उससे भी पहले वाले का। इस कमरे में उससे पहले कितने लोग रहे होंगे — यह उसने कभी नहीं सोचा था।

उसने दीवार पर हाथ फेरा। टेप के चार निशान थे — जहाँ पहले साल का कैलेंडर लगा था, जहाँ एक फोटो लगाने की सोची थी पर कभी लगाई नहीं, जहाँ बिजली का तार दबाकर रखा था, और एक जो याद नहीं कब और क्यों बना। सब पीले थे, थोड़े उठे हुए, जैसे दीवार को याद हो जो उसे नहीं।

3 weeks ago
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रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आखिरी बर्तन कार्डबोर्ड के डिब्बे में रखा।

कमरा अब वैसा नहीं लग रहा था जैसा तीन साल पहले था — जब वो पहली बार दरवाज़े में घुसी थी और सोचा था, यह काम चलेगा। अब दीवारों पर जगह-जगह टेप के निशान थे। कुछ काले, कुछ पीले पड़े हुए। एक निशान पर उसकी नज़र रुकी। वहाँ कभी माँ की तस्वीर लगी थी — वो वाली, जिसमें माँ हँस रही थीं और उनके पीछे गुलमोहर का पेड़ था।

पंखा अभी भी चल रहा था। मकान मालकिन ने बिजली का मीटर कल काटने को कहा था, आज नहीं। तो पंखा चलता रहा — बेमतलब, उस खाली कमरे में जिसमें अब कोई चीज़ नहीं थी जो आवाज़ सोख सके।

1 month ago
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रात के चार बजकर पैंतीस मिनट।

प्लेटफ़ॉर्म नंबर दो पर एक औरत अपनी थर्मस की टोपी खोल रही थी। थर्मस पुराना था — उसकी टोपी पर भूरा टेप लगा था, जो किसी चीज़ को ठीक नहीं करता, बस उसे थामे रखता है। उसने गर्म पानी एक कागज़ के कप में उड़ेला। भाप उठी, ठंडी हवा में घुली, और गायब हो गई।

पास वाली बेंच पर एक Nokia चार्जर का तार लटक रहा था — किसी झोले से आधा बाहर, मालिक के बिना। हल्की हवा में हिल रहा था, जैसे किसी के जाने के बाद का हाथ।

1 month ago
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रात के ग्यारह बजे वो आखिरी बक्से की टेप बंद कर रही थी, जब बिजली चली गई।

कमरे में अँधेरा था, पर वो उठी नहीं। मोबाइल की रोशनी में दीवार दिखी — उस जगह जहाँ साल भर से एक कैलेंडर लटका था, वहाँ अब बस दो टेप के पीले निशान रह गए थे। जैसे दीवार ने याद रखने की कोशिश की हो।

सुबह ट्रक आएगा। यह उसका आखिरी किराए का घर था इस शहर में — पाँच साल। पहले साल उसने खिड़की के पास एक थर्मस रखा था, हर सुबह उसमें चाय भरती थी। थर्मस कहीं पैक हो गया था, कब — याद नहीं।

2 months ago
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रात के चार बजकर पैंतीस मिनट। प्लेटफ़ॉर्म नंबर दो।

एक आदमी टिफ़िन खोल रहा था — ठंडे पराठे, एक खाली थर्मस जिसे उसने फिर भी उठाकर झुकाया, जैसे भूल गया हो कि उसमें कुछ नहीं बचा।

वह कूली नहीं था, पर उसकी आँखें किसी थकी हुई चीज़ की आँखें थीं। चप्पल के नीचे प्लेटफ़ॉर्म का एक टूटा टाइल था, और वह उसे बार-बार नापता रहता — दाहिना पैर, बाँया, फिर दाहिना। जैसे सो नहीं सकता था, पर बैठे रहना भी नहीं हो रहा था।

2 months ago
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रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आख़िरी बॉक्स बांधा। कमरा खाली था — सिवाय उस नोकिया के चार्जर के, जो खिड़की के पास की दरार में अभी भी फँसा था।

दीवार पर टेप के चार निशान थे। उसने हाथ लगाया — कागज़ की तरह ठंडे। वहाँ पहले कैलेंडर था, दूसरी वाली की तरफ़ से लगाया हुआ, उस साल का जो अब रहा नहीं। उसे याद नहीं था उस साल में क्या हुआ था। बस इतना याद था कि दिसंबर में एक दिन वो कैलेंडर खुद ही नीचे गिर गया था। टेप फिर भी रहा।

बाहर से ऑटो का हॉर्न आया। उसने जवाब नहीं दिया।

3 months ago
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रात के दो बजे थे जब उसने आख़िरी कार्डबोर्ड बॉक्स बंद किया।

कमरा अब खाली था। छत के पंखे के नीचे एक पुरानी nokia चार्जर की तार लटकी हुई थी — वो भूल गई थी उसे। दीवार पर तीन जगह टेप के निशान थे, हल्के पीले, जैसे किसी की उँगलियाँ छूकर चली गई हों।

उसने बॉक्स को दरवाज़े के पास धकेला और वापस बीच कमरे में आ गई।

4 months ago
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आज सुबह खिड़की के पास बैठी थी जब एक पुरानी कविता की पंक्ति याद आई—"शब्द वही होते हैं जो चुप्पी को तोड़ते हैं, बाकी सब शोर है।" मैंने अपनी डायरी खोली, लेकिन कलम हाथ में लेते ही वह सफेद पन्ना मुझे घूरने लगा। कुछ दिन पहले एक कहानी शुरू की थी—एक औरत के बारे में जो अपने ही घर में खो जाती है। लेकिन आज उसका अंत नहीं मिल रहा था।

बाहर गली में किसी बच्चे की आवाज़ आई, "अम्मा, यह तितली कहाँ जा रही है?" मां ने कुछ जवाब दिया होगा, पर मुझे सुनाई नहीं दिया। बस वह सवाल रह गया। मैंने सोचा, शायद मेरी कहानी की औरत भी यही पूछ रही है—कहाँ जा रही हूँ मैं?

दोपहर में चाय बनाते हुए एक छोटा सा प्रयोग किया। हमेशा तीन चम्मच चीनी डालती हूँ, आज दो ही डाली। स्वाद अलग था—कड़वा नहीं, बस असली। चाय के कप को दोनों हाथों से पकड़ा, उसकी गरमाई हथेलियों में महसूस की। सोचा, क्या मैं अपनी कहानियों में भी बहुत मीठापन घोल देती हूँ? क्या डर है मुझे सच्चाई की कड़वाहट से?

4 months ago
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सूरज ढलने के बाद की वह घड़ी थी जब आसमान न दिन का रहता है न रात का। मैं छत पर बैठी थी, एक पुरानी डायरी और कलम हाथ में, लेकिन पन्ने खाली थे। हफ्तों से कुछ लिख नहीं पाई थी—शब्द जैसे किसी और दुनिया में चले गए हों।

तभी पड़ोस से एक आवाज़ आई। बूढ़ी नानी अपनी पोती से कह रही थीं, "कहानियाँ सुनाने से पहले उन्हें जीना पड़ता है, बेटा।" मैं रुक गई। वह वाक्य कानों में गूँजता रहा।

मैंने देखा कि छत के कोने में एक पौधा था जिसे मैंने महीनों से नहीं देखा था। उसमें एक छोटा सा पीला फूल खिला था—बिना किसी की देखभाल के, बिना किसी की उम्मीद के। मैंने उसे छुआ। पंखुड़ियाँ मखमली थीं, और हवा में हल्की सी मीठी गंध थी।

5 months ago
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आज सुबह खिड़की के पास बैठे हुए मैंने देखा कि पुरानी आम की डाली पर एक कौआ बैठा था। वह कुछ देर तक चुपचाप रहा, फिर अचानक उड़ गया। मैं सोच रही थी कि क्या उसने मुझे देखा था, या बस हवा का झोंका उसे ले गया। कभी-कभी छोटी-छोटी चीजें बड़े सवाल छोड़ जाती हैं।

दोपहर में मैंने एक कहानी लिखने की कोशिश की। पहले तो शब्द आसानी से आ रहे थे, लेकिन बीच में कहीं रुक गई। मैंने सोचा कि शायद मैं बहुत सोच रही हूं। तो मैंने पन्ना बंद किया और चाय बनाने चली गई। चाय की भाप में कुछ था—वह गर्मी, वह खुशबू—जो मुझे फिर से लिखने के लिए प्रेरित कर गई।

शाम को एक पुरानी किताब खोली। पन्नों पर धूल जमी थी। एक पंक्ति पढ़ी: "जो खो गया है, वह कभी सच में हमारा था भी या नहीं?" यह सवाल मेरे दिमाग में घूमता रहा। मैंने सोचा कि कहानियां भी ऐसी होती हैं—वे हमारे अंदर रहती हैं, लेकिन कभी पूरी तरह हमारी नहीं होतीं।