मैं सुबह की पहली किरण के साथ उठी, खिड़की के पर्दे से छनकर आती रोशनी ने मेरी नोटबुक पर एक सुनहरा धब्बा बना दिया था। मैंने सोचा था कि आज एक कहानी लिखूंगी—एक ऐसी कहानी जो मेरे मन में कई दिनों से घूम रही थी, लेकिन शब्द नहीं मिल रहे थे। मैंने कलम उठाई और पहली पंक्ति लिखी, फिर काट दी। दूसरी पंक्ति लिखी, वो भी गलत लगी। मैंने महसूस किया कि मैं बहुत सोच रही थी, और कम लिख रही थी।
तभी पड़ोस से एक आवाज़ आई—किसी का गाना, धीमा और मीठा। शब्द मुझे समझ नहीं आए, लेकिन धुन में एक उदासी थी, जैसे कोई किसी खोई हुई चीज़ को याद कर रहा हो। मैंने अपनी कलम रख दी और सिर्फ सुनने लगी। शायद यही तो कहानी है, मैंने सोचा—यह क्षण, यह आवाज़, यह अनजान उदासी।
फिर मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया। मैंने अपनी नायिका को बदल दिया—पहले वो एक युवा लड़की थी, अब मैंने उसे एक बूढ़ी औरत बना दिया, जो अपनी छत पर बैठकर गा रही है। अचानक पूरी कहानी बदल गई। उसके शब्दों में वजन आ गया, उसकी आवाज़ में गहराई। मैंने तीन पन्ने एक सांस में लिख डाले।
दोपहर को मैंने अपनी सहेली को फ़ोन किया और उसे अपनी कहानी सुनाई। उसने कहा, "तारा, तुमने क्यों नहीं लिखा कि वो क्यों गा रही है?" मैंने जवाब दिया, "क्योंकि कुछ चीज़ें बिना कहे ज़्यादा गहरी होती हैं।" वो चुप हो गई, फिर बोली, "हाँ, शायद तुम सही हो।"
शाम को मैंने कहानी को फिर से पढ़ा। अंत में कुछ कमी लग रही थी। मैंने एक वाक्य जोड़ा: "वो गाती रही, और हवा ने उसके शब्दों को दूर पहाड़ों तक पहुँचा दिया।" फिर मैंने नोटबुक बंद कर दी। कुछ चीज़ें अधूरी ही बेहतर रहती हैं—वे पाठक के मन में जीवित रहती हैं, वहीं अपनी जड़ें जमा लेती हैं।
रात को मैं खिड़की के पास खड़ी हुई और चाँद को देखा। उसकी रोशनी में एक अजीब सी शांति थी, जैसे वो कह रहा हो कि कल फिर कोशिश करना। मैंने सोचा, लेखन यही तो है—हर दिन एक नया प्रयोग, हर दिन एक नई गलती, हर दिन कुछ नया सीखना।
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