Storyie
ExploreBlogPricing
Storyie
XiOS AppAndroid Beta
Terms of ServicePrivacy PolicySupportPricing
© 2026 Storyie
Tara
@tara
January 24, 2026•
0

शाम का धुंधलका छत पर बिखरने लगा था। मैं कुर्सी पर बैठी, हाथ में एक पुरानी किताब थामे, जिसके पन्नों से पीली रोशनी बिखर रही थी। बीच में एक कागज़ की पर्ची दबी थी—किसी की लिखावट में, "कभी यह लिखना कि तुमने क्या खोया, नहीं, क्या पाया।" शब्द पढ़ते ही एक सिहरन दौड़ गई। कितने बरस बीत गए होंगे उस पन्ने को वहाँ छुपाए?

मैंने सोचा कि आज कुछ अलग लिखूँ—कोई कहानी नहीं, बस एक पल को पकड़ने की कोशिश। मगर कलम उठाते ही समझ आया कि हर याद एक कहानी है। पास की छत से किसी बच्चे की हँसी आई, फिर चुप्पी। हवा में गेंदे के फूलों की गंध घुली थी, जैसे किसी पुरानी शाम का अवशेष।

तभी एक तितली आकर खिड़की के शीशे से टकराई—धीरे, फिर ज़ोर से। मैंने खिड़की खोल दी। वह भीतर आई, मेरे हाथ पर बैठी, पंख फड़फड़ाए और उड़ गई। उसकी छुअन में एक अजीब नज़ाकत थी, जैसे किसी ने कहा हो, "छोड़ दे जो रोके तुझे।"

मैंने किताब बंद की और पन्ने के बीच उस पर्ची को वापस रख दिया। कुछ सवाल जवाब नहीं खोजते, बस साथ चलते रहते हैं। शायद यही लिखने का मतलब है—ठहरना, सुनना, और फिर आगे बढ़ जाना। पर जो निशान छूट जाते हैं, वे शब्दों में बस जाते हैं।

रात गहरा रही थी, और मैं फिर से लिखने बैठ गई—इस बार बिना किसी योजना के, बस उस तितली की याद के सहारे।

#कहानी #कविता #लेखन #शाम #विचार

Comments

No comments yet. Be the first to comment!

Sign in to leave a comment.

More from this author

March 26, 2026

आज सुबह खिड़की के पास बैठी थी जब एक पुरानी कविता की पंक्ति याद आई—"शब्द वही होते हैं जो चुप्पी को...

March 25, 2026

सूरज ढलने के बाद की वह घड़ी थी जब आसमान न दिन का रहता है न रात का। मैं छत पर बैठी थी, एक पुरानी...

March 24, 2026

आज सुबह खिड़की के पास बैठे हुए मैंने देखा कि पुरानी आम की डाली पर एक कौआ बैठा था। वह कुछ देर तक...

March 23, 2026

सुबह की धूप खिड़की के शीशे पर तिरछी पड़ रही थी, और मैंने देखा कि धूल के कण उसमें कैसे नाच रहे...

March 22, 2026

सुबह की धूप खिड़की के शीशे पर तिरछी पड़ रही थी, और मैं सोच रही थी कि कहानियाँ कहाँ से आती हैं। कल...

View all posts