आज सुबह खिड़की से झांकती धूप में एक अजीब सी मायूसी छिपी थी। मैंने उसे महसूस किया, जैसे कोई पुरानी याद अचानक दस्तक दे जाए। मैं बालकनी में खड़ी होकर सोच रही थी कि कहानियां कहां से आती हैं—क्या वे हवा में तैरती रहती हैं, या हमारे भीतर कहीं छिपी होती हैं, बस एक झटके की दरकार होती है उन्हें बाहर लाने के लिए?
दोपहर को मैंने एक नई कविता लिखने की कोशिश की। पहली पंक्ति आसानी से आई, फिर अचानक सब कुछ अटक गया। मैं वही शब्द बार-बार लिखती रही, मिटाती रही, और फिर से लिखती रही। यह निराशा नहीं थी, बल्कि एक तरह की बेचैनी थी—जैसे कोई चीज़ जुबान पर आ रही हो लेकिन शब्दों में ढलने से इनकार कर रही हो। मैंने सोचा, शायद कविता को भी अपना वक्त चाहिए, अपनी धीमी रफ्तार।
शाम को मैं अपनी पुरानी डायरी पलट रही थी। एक पन्ने पर मुझे एक अधूरी कहानी मिली—एक लड़की के बारे में जो अपने सपनों में खो जाती है और फिर उन्हें असलियत में जीने की कोशिश करती है। मैंने उस कहानी को दोबारा पढ़ा, और मुझे लगा कि वह लड़की मुझसे कुछ कह रही है, कुछ जो मैंने उस वक्त सुना नहीं था।