रात के ग्यारह बजे थे जब उसने कमरे का आख़िरी बल्ब बंद किया। फिर याद आया कि चाबी लौटानी है मकान मालकिन को, तो वापस जलाया।
कमरा खाली था। दीवारें वैसी ही थीं — बस पहले अपनी लगती थीं, अब नहीं लगतीं। एक पुराना nokia चार्जर सॉकेट में अटका रह गया था, काला पड़ा हुआ। कब से था, याद नहीं। शायद पहले वाले किरायेदार का, या उससे भी पहले वाले का। इस कमरे में उससे पहले कितने लोग रहे होंगे — यह उसने कभी नहीं सोचा था।
उसने दीवार पर हाथ फेरा। टेप के चार निशान थे — जहाँ पहले साल का कैलेंडर लगा था, जहाँ एक फोटो लगाने की सोची थी पर कभी लगाई नहीं, जहाँ बिजली का तार दबाकर रखा था, और एक जो याद नहीं कब और क्यों बना। सब पीले थे, थोड़े उठे हुए, जैसे दीवार को याद हो जो उसे नहीं।