मैंने आज एक पुरानी किताब के पन्नों के बीच एक सूखा गुलाब का फूल पाया। पंखुड़ियां इतनी नाजुक थीं कि छूते ही टूट जाएं, मगर उनका रंग अभी भी वही गहरा लाल था—जैसे किसी ने वक्त को कागज के बीच दबा दिया हो। मुझे याद नहीं कि यह कब, किसने, किस वजह से रखा था। शायद मैंने खुद रखा होगा, किसी ऐसे दिन जो अब धुंधला हो चुका है।
शाम को चाय बनाते हुए मैंने सोचा—क्या हम भी ऐसे ही सूख जाते हैं? अपनी यादों के बीच दबे, पन्नों की तरह पतले होते, फिर भी किसी रंग को, किसी सुगंध को थामे? मैंने गुलाब को खिड़की के पास रख दिया, जहां शाम की रोशनी उस पर गिर रही थी। वह वहीं रहा, हिला नहीं, मगर लगा जैसे वह सांस ले रहा हो—धीमी, बमुश्किल, पर जिंदा।
रात में मैंने एक कहानी लिखने की कोशिश की। एक औरत के बारे में जो फूलों की दुकान चलाती है, मगर खुद कभी फूल नहीं खरीदती। वह हर सुबह ताजे गुलाब सजाती है, मगर घर जाते वक्त कुम्हलाए फूलों को कूड़े में फेंक देती है। उसे लगता है कि फूल उसके लिए नहीं—वे उसकी ज़िंदगी में सिर्फ गुजरते हैं, ठहरते नहीं। मैंने तीन पैराग्राफ लिखे, फिर रुक गई। मुझे नहीं पता कि वह औरत क्या चाहती है।
तब मुझे वह सूखा गुलाब फिर याद आया। शायद वह सिर्फ ठहरना चाहता था—किसी पन्ने के बीच, किसी याद के बीच, कहीं जहां उसे फेंका न जाए। मैंने उसे फिर से किताब में रख दिया, इस बार ध्यान से। और सोचा—शायद कहानी खत्म नहीं होती, बस दब जाती है। जब तक कोई उसे फिर से न खोले।
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