सुबह की धूप थोड़ी अलग थी आज—जैसे किसी ने आसमान पर हल्का पीला फिल्टर लगा दिया हो। मैं निकला था पास के बाज़ार की तरफ, सोचा था बस घूमने का मन है, कोई खास काम नहीं। लेकिन रास्ते में एक पुरानी गली में घुस गया, जहाँ पहले कभी नहीं गया था। दीवारों पर हरे रंग की काई जमी थी, और एक छोटी सी चाय की दुकान के बाहर लोग खड़े होकर कुल्हड़ में चाय पी रहे थे। मैंने सोचा, क्यों नहीं? और एक कुल्हड़ मैंने भी ले लिया।
दुकान वाले अंकल ने पूछा, "पहली बार आए हो ना यहाँ?" मैंने हाँ में सिर हिलाया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "अच्छा है, नई जगह देखना। लेकिन ध्यान रखना, यहाँ से आगे की गली में कुत्तों का गिरोह है।" मैं हंस पड़ा—गिरोह! जैसे कोई गैंगस्टर फिल्म का सीन हो। पर सच में, आगे बढ़ा तो तीन-चार कुत्ते बैठे थे, बिल्कुल शांत, धूप में सो रहे थे। मुझे अपनी छोटी सी गलती का एहसास हुआ—मैंने बिना रास्ता जाने, अनजान गली में घुस गया था। पर कभी-कभी यही तो मज़ा है, ना?
वापसी में मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया। आमतौर पर मैं वापस उसी रास्ते से आता हूँ, लेकिन आज सोचा कि दूसरा रास्ता लूँगा। थोड़ा लंबा था, पर ज़्यादा खुला और हवादार। रास्ते में एक पार्क मिला जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था—बच्चे झूला झूल रहे थे, और एक बुज़ुर्ग जोड़ा बेंच पर बैठकर कुछ बातें कर रहा था। मुझे लगा कि शायद हमेशा एक ही रास्ते से चलना थोड़ा बोरिंग है। कभी-कभी बदलाव ज़रूरी है, चाहे वो सिर्फ दस मिनट की देरी ही क्यों न हो।
घर पहुँचकर मैंने सोचा, क्या अगली बार किसी दोस्त को भी साथ लूँ? या फिर अकेले ही घूमना बेहतर है? कभी-कभी अकेले चलने में एक अलग ही मज़ा है—तुम सिर्फ अपने आस-पास की चीज़ों को देखते हो, बिना किसी बातचीत के। लेकिन साथ में कोई हो तो वही छोटी-छोटी बातें और भी मज़ेदार लगती हैं। शायद अगली बार दोनों ही करूँगा—कभी अकेले, कभी साथ। फिलहाल तो बस यही सोच रहा हूँ कि कल किस नई गली में घुसूँगा।
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