आज का इरादा था कि कश्मीरी गेट से लाल क़िला तक पैदल जाऊँगा — मेट्रो वाली लाइन के नीचे-नीचे, सड़क पकड़कर। नक्शे पर दूरी डेढ़ किलोमीटर दिखती है, लेकिन रास्ते में जितनी गलियाँ हैं उन्हें गिनो तो शायद पाँच हो जाती है।
कश्मीरी गेट स्टेशन के गेट नंबर चार से निकला — या जो मुझे चार लगा, दरअसल वो दो था। ये जानकारी तब हुई जब सामने की सड़क पर ट्रैफ़िक उल्टा बह रहा था। फ़ोन निकाला, मैप खोला, और तीन मिनट तक उसे उल्टा पकड़े रहा — जब तक एक ऑटो वाले ने खिड़की से सिर निकालकर पूछा, "भाई, कहाँ जाना है?" मुझे ख़ुद ठीक से पता नहीं था, तो बस मुस्कुराकर निकल गया।
थोड़ा आगे चला तो एक पुरानी दुकान दिखी — लकड़ी के बोर्ड पर पेंट से लिखा "रामलाल एंड संस — बरतन, चाय, राशन।" तीनों का कोई आपसी रिश्ता नहीं लगा, लेकिन दुकान खुली थी तो शायद काम चल रहा होगा। बोर्ड का रंग कुछ इस तरह उड़ा हुआ था कि 'एंड' का 'ए' लगभग गायब था — अब वो "रामलाल & संस" जैसा दिखता था, जो शायद ज़्यादा आधुनिक है। मुझे वो फेडेड 'ए' ज़्यादा पसंद था।