मैंने आज सुबह सात बजे फैसला किया कि मैं उस गली से होकर जाऊंगा जहां से मैं कभी नहीं गया। पुरानी इमारतें, टूटी सड़कें, और एक छोटी सी चाय की दुकान जिसका नाम "सुबह की चाय" था। मालिक ने मुस्कुराकर पूछा, "पहली बार आए हो ना भाई?" मैंने हां में सिर हिलाया। उसने कहा, "यहां हर कोई पहले दिन खो जाता है, फिर वापस आ जाता है।" मैंने सोचा, ये तो फिलॉसफी हो गई।
चाय की चुस्की लेते हुए मैंने देखा कि एक बुजुर्ग आदमी अपनी साइकिल को धक्का देकर ले जा रहा था। पहिया पंचर था, मगर वो गुनगुना रहा था। मैंने पूछा, "अंकल, गाना कौन सा है?" उन्होंने कहा, "कोई पुराना, नाम याद नहीं, बस धुन याद है।" मुझे लगा कि कभी-कभी धुन ही काफी होती है, शब्द तो बाद में भी मिल जाते हैं।
आगे बढ़ा तो एक छोटे से पार्क में बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। गेंद मेरे पास आई, मैंने सोचा कि शानदार कैच मारूंगा। नतीजा? गेंद उछलकर मेरे चश्मे पर लगी और मैं हंसते-हंसते बैठ गया। बच्चों ने माफी मांगी, मैंने कहा, "कोई बात नहीं, मुझे भी याद आ गया कि मैं स्पोर्ट्समैन नहीं हूं।" छोटी-छोटी गलतियां याद दिला देती हैं कि हम इंसान हैं, सुपरमैन नहीं।
वापसी में मैंने एक दीवार पर लिखा देखा: "रास्ते बदलो, मंजिल नहीं।" सोचने लगा कि कितनी बार हम एक ही रास्ते पर चलते रहते हैं, बस इसलिए कि वो जाना-पहचाना है। आज की सुबह ने सिखाया कि कभी-कभी खो जाना भी एक तरह की खोज है। नए रास्ते, नई गलियां, नए लोग, और हां, नई चाय की दुकानें भी।
अब सोच रहा हूं, कल किस गली में जाऊं? और क्या खोजूं जो अभी तक नहीं देखा? शायद कोई पुराना बुकस्टोर, या फिर कोई ऐसा कोना जहां लोग बस बैठकर आसमान देखते हों। चलो, देखते हैं कल क्या लेकर आता है।
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