आज का इरादा था — चाँदनी चौक मेट्रो से निकलकर पुराने बाज़ार की तरफ़ पैदल, फिर नली-वाली गली होते हुए...
आज का इरादा था — चाँदनी चौक मेट्रो से निकलकर पुराने बाज़ार की तरफ़ पैदल, फिर नली-वाली गली होते हुए...
आज का plan था Chandni Chowk मेट्रो से निकलकर Kashmere Gate तक पैदल जाना। दूरी ज़्यादा नहीं — तीन...
आज का इरादा था — लाल किला मेट्रो से चाँदनी चौक तक पैदल, बीच में जो भी आए। दूरी ज़्यादा नहीं, शायद...
आज सोचा था कि जामा मस्जिद से चाँदनी चौक तक पैदल निकलूँगा — बस दो स्टेशनों के बीच का फ़ासला, कितना...
आज का इरादा था — लाल क़िले वाले मेट्रो स्टेशन से नेताजी सुभाष मार्ग होते हुए चाँदनी चौक तक पैदल...
आज सुबह छह बजे निकला था, सोचा कि पुरानी दिल्ली की गलियों में कुछ नया मिलेगा। चांदनी चौक के पास एक संकरी गली में मुड़ा जहाँ पहले कभी नहीं गया था। दीवारों पर हल्की नारंगी धूप पड़ रही थी, और हवा में तली हुई पूड़ियों की महक थी।
एक छोटी सी चाय की दुकान के बाहर रुका। दुकानदार ने पूछा, "पहली बार आए हो यहाँ?" मैंने हाँ में सिर हिलाया। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "यह गली अभी शांत है, दो घंटे बाद यहाँ पैर रखने की जगह नहीं मिलेगी।" उसकी बात सच निकली—जब मैं लौटा तो वही जगह लोगों, ठेलों और आवाज़ों से भरी हुई थी।
मैंने एक गलती की—गूगल मैप पर भरोसा करके एक शॉर्टकट लिया, लेकिन वह रास्ता निर्माणाधीन निकला। बीस मिनट घूमने के बाद समझ आया कि कभी-कभी पुराने ढंग से, लोगों से पूछकर रास्ता ढूँढना बेहतर होता है। एक रिक्शा वाले ने मुझे सही दिशा दिखाई, और मुझे लगा कि शहर को समझने का असली तरीका यही है—लोगों से बात करना, न कि स्क्रीन को घूरना।
एक जगह मैंने देखा कि एक बुजुर्ग आदमी अपनी छत पर कबूतरों को दाना डाल रहा था। वे सब एक साथ उड़े और आसमान में एक अजीब सी लहर बना गए। उस पल मुझे लगा कि शहर में भी प्रकृति के छोटे-छोटे नमूने छिपे हुए हैं, बस देखने की नज़र चाहिए।
लौटते समय सोच रहा था—क्या हर गली का अपना एक समय होता है, जब वह सबसे ज़्यादा खुद होती है? क्या मुझे सुबह छह बजे की गलियाँ पसंद हैं या दोपहर की भीड़-भाड़ वाली? शायद अगली बार किसी और समय निकलूँगा और देखूँगा।
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