आज का लक्ष्य था चाँदनी चौक से चावड़ी बाज़ार तक पैदल। मेट्रो में डेढ़ मिनट का रास्ता, पैदल दो घंटे। नक्शे में उँगली जितना फ़ासला दिखता है, ज़मीन पर उँगली उठाकर रास्ता पूछना पड़ता है।
गेट से निकला — नंबर चार था या पाँच, धूप में बोर्ड पढ़ नहीं पाया। दाईं तरफ़ रास्ता था पर मैं बाईं तरफ़ चला गया, क्योंकि वहाँ एक नीली पुरानी दीवार थी जिस पर पीले अक्षरों में लिखा था: "श्री राधे पेंट्स एंड हार्डवेयर — 1947 से।" उस साल को देखकर लगा इमारत और दुकान एक साथ खड़ी हुई होंगी। रंग दोनों का थका हुआ था, पर टिके हुए थे।
थोड़ा आगे एक ढकी हुई नाली के ऊपर से गुज़रा। कंक्रीट की स्लैब पर किसी ने दुकान का कैरेट रख दिया था, उसके नीचे से पानी की धीमी आवाज़ आ रही थी। पता नहीं वो पानी कहाँ जा रहा था — पर मुझसे ज़्यादा आत्मविश्वास के साथ ज़रूर।
एक छोटी थड़ी पर रुका। चाय वाले ने बिना पूछे कुल्हड़ में डाल दी — इलायची ज़्यादा, चीनी कम। पहली चुस्की कड़वी थी, दूसरी ठीक लगी। कुल्हड़ से मिट्टी की वो गंध उठ रही थी जो थर्मस में कभी नहीं होती। मैंने नमस्ते बोला, दुकानदार हल्का मुस्कुराया — शायद इसलिए कि मैं साफ़-ज़ाहिर तौर पर उसका पुराना ग्राहक नहीं था। मैं भी मुस्कुरा दिया और चाय पीता रहा।
एक तिराहे पर एक ऑटो खड़ा था — एकदम तिरछा, जैसे उसे भी ज़्यादा देर रुकने की उम्मीद नहीं थी। उसके पीछे एक बोर्ड था जिस पर पुराने पेंट से "ताज़ा समोसे" लिखा था। मैंने एक लिया — बाहर से कड़क, अंदर से गर्म, आलू में हरी मिर्च थोड़ी ज़्यादा थी। खाते-खाते आगे चलता रहा।
चावड़ी बाज़ार की तरफ़ बढ़ते हुए एक बात नोट की — इधर दुकानों के बोर्ड हर सौ क़दम पर भाषा बदलते हैं। हिंदी, फिर उर्दू, फिर वापस हिंदी। शहर चुपचाप एक से दूसरे में खिसकता रहता है, बिना किसी घोषणा के।
स्टेशन पर पहुँचा तो पैर थोड़े भारी थे। मेट्रो में बैठकर सोचा — डेढ़ मिनट में ये सब नहीं होता।
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