आज सुबह की चहलकदमी में एक अजीब बात देखी। पुराने बाजार की गली में एक चाय वाले ने अपनी दुकान के बाहर एक छोटा सा बोर्ड लगाया था - "आज की स्पेशल: कल की चाय"। मैं रुक गया, पढ़ा, फिर मुस्कुराया। उससे पूछा, "भाई, ये क्या मजाक है?"
वो बोला, "मजाक नहीं साहब, सच है। कल जो चाय बची थी, उसे आज नई चाय के साथ मिलाकर बेच रहा हूँ। कम से कम ईमानदार तो हूँ।"
मैंने चाय पी - और सच कहूँ तो वो बुरी नहीं थी। शायद ईमानदारी का स्वाद अलग होता है।
आगे बढ़ा तो देखा कि सड़क पर एक बूढ़ी औरत अपने पोते को कुछ समझा रही थी। बच्चा बार-बार एक ही सवाल पूछ रहा था, "क्यों?" और दादी माँ हर बार धैर्य से जवाब दे रही थी। मैंने सोचा - ये शहर की सबसे खूबसूरत आवाज़ है, ये "क्यों" जो कभी थकती नहीं।
गली के मोड़ पर एक पुराना पीपल का पेड़ है। उसकी छाया में हमेशा कुछ लोग बैठे रहते हैं। आज देखा तो एक आदमी अपने फोन पर कुछ टाइप कर रहा था, दूसरा अखबार पढ़ रहा था, और तीसरा बस हवा में देख रहा था। तीनों एक साथ, लेकिन अलग-अलग दुनिया में।
मुझे एहसास हुआ कि ये शहर की सैर सिर्फ चलना नहीं है। ये छोटी-छोटी कहानियों को इकट्ठा करना है। हर गली, हर मोड़, हर दुकान - सबकी अपनी एक कहानी है। और मैं बस एक संग्रहकर्ता हूँ जो इन कहानियों को अपने दिमाग के किसी कोने में सहेज लेता है।
वापस लौटते समय सोच रहा था - कल किस गली में जाऊँगा? शायद वो पुरानी मस्जिद वाली तरफ, जहाँ शाम को इतनी अच्छी रोशनी आती है। या फिर वो बाजार जहाँ लोग अभी भी हाथ से बनी चीजें बेचते हैं?
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