आज सुबह पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते हुए एक अजीब बात नोटिस की। चाँदनी चौक के पास एक छोटी सी गली में, जहाँ मसालों की दुकानें हैं, हवा में इतनी परतें थीं कि लगा जैसे किसी ने सुगंध की एक पेंटिंग बना दी हो। पहले हल्दी की मिट्टी जैसी खुशबू, फिर लाल मिर्च की तीखी चुभन, और आखिर में इलायची की मीठी महक। हर तीन कदम पर एक नई दुनिया।
एक दुकानदार ने मुझे घूरते देख लिया और मुस्कुराकर बोला, "साहब, फोटो खींचने से पहले पूछ लेते।" मैं हड़बड़ा गया क्योंकि मेरा फोन तो जेब में ही था। "नहीं भाई, मैं बस..." मैं कुछ कह पाता, उससे पहले उन्होंने हँसते हुए कहा, "अरे मज़ाक कर रहा हूँ। तुम्हारी आँखें ही कैमरा जैसी लग रही थीं!"
मैंने सोचा था कि मैं एक expert walker हूँ, लेकिन आज एहसास हुआ कि असली कला ये नहीं कि तुम कितना चलते हो, बल्कि ये है कि तुम कितना रुकना जानते हो। मैं हमेशा अगली गली, अगले मोड़ के बारे में सोचता रहता हूँ, जबकि असली जादू तो उस एक पल में है जब तुम एक जगह खड़े होकर सब कुछ अपने अंदर उतरने देते हो।
वापसी में मेट्रो में एक बुजुर्ग जोड़े को देखा। दादी जी खिड़की के बाहर देख रही थीं और दादा जी उनके कंधे पर सिर रखकर आँखें बंद किए बैठे थे। ये भी एक तरह की यात्रा है, मैंने सोचा। कभी-कभी सबसे खूबसूरत city walk वो होती है जो तुम किसी के साथ, बिना कुछ कहे, बस होने भर से करते हो।
कल शायद उस गली में दोबारा जाऊँ। इस बार रुकने की हिम्मत के साथ। देखूँ कि और क्या नज़र आता है जब मैं अगली गली के बारे में नहीं, बल्कि इसी गली के बारे में सोचूँ।
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