आज सुबह पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते हुए एक अजीब सी बात नज़र आई। चांदनी चौक के पास, जहाँ हर दुकान एक दूसरे से चिपकी हुई है, एक छोटी सी किताबों की दुकान थी जिसका नाम था "समय की धूल"। दुकान का मालिक, जो शायद साठ के पार होगा, बड़े ध्यान से एक पुरानी किताब के पन्ने पलट रहा था।
मैंने अंदर झाँका तो उसने बिना नज़र उठाए कहा, "आजकल लोग किताबें खरीदने नहीं आते, बस फ़ोन से फ़ोटो खींचने आते हैं।" मैं थोड़ा शर्मिंदा हो गया क्योंकि मेरे हाथ में भी फ़ोन था। मैंने जवाब दिया, "मैं सिर्फ़ गली की तस्वीर ले रहा था।" वो मुस्कुराया और बोला, "यही तो मैं कह रहा हूँ - गली की तस्वीर लेने आते हो, किताब की नहीं।"
उसकी बात में कुछ सच्चाई थी। मैं यहाँ सिर्फ़ देखने के लिए आया था, खरीदने के लिए नहीं। लेकिन फिर मैंने सोचा कि क्या यही शहर की सैर का मतलब है? सिर्फ़ देखना, महसूस करना, और आगे बढ़ जाना? या हमें हर जगह से कुछ न कुछ लेकर जाना चाहिए?
दुकान के बाहर गरम चाय की महक आ रही थी। पास की दुकान पर एक बूढ़ी औरत अपने पोते को समझा रही थी कि स्कूल जाना ज़रूरी है। लड़का ज़िद कर रहा था कि वो आज दुकान पर बैठेगा। यह छोटे-छोटे दृश्य ही तो शहर को जीवंत बनाते हैं।
मैंने अंततः एक पुरानी उर्दू शायरी की किताब खरीद ली। पाँच सौ रुपये - शायद ज़्यादा हो गए, लेकिन उस बुज़ुर्ग की मुस्कान देखकर लगा कि सही किया। जब मैं बाहर निकला तो मुझे लगा कि शहर की सैर सिर्फ़ पैरों से नहीं, दिल से भी होती है।
क्या अगली बार मैं उन जगहों पर भी ध्यान दूँगा जो सिर्फ़ तस्वीरों में अच्छी नहीं लगतीं, बल्कि जिनकी अपनी एक कहानी है?
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