आज सुबह की सैर में पुरानी गली के उस छोटे से चाय वाले के पास रुका। धूप अभी तिरछी थी, और दुकान के सामने की नाली से उठती भाप में इलायची की महक घुल रही थी। चाय वाला भैया ने मुझे पहचान लिया, "रोज़ का ग्राहक हो, भाई साहब। आधी चीनी?" मैंने हाँ में सिर हिलाया।
पास की बेंच पर बैठकर मैंने देखा कि सामने के मंदिर की घंटी बज रही थी, और एक बूढ़ी औरत धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। उसके हाथ में फूलों की एक छोटी टोकरी थी। मुझे याद आया कि पिछले हफ्ते मैं इसी जगह पर अपना बैग भूल गया था—दुकान वाले ने संभाल कर रखा था। छोटी जगहों में यही तो खूबसूरती है।
मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया आज। हमेशा मैं गली के दाहिने तरफ से चलता हूँ, लेकिन आज बायीं तरफ से निकला। अजीब बात है, वही गली दूसरे कोण से बिल्कुल अलग लगी। दीवारों पर पुराने पोस्टर, एक छुपी हुई किताबों की दुकान, और एक कोने में बैठा वह कुत्ता जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
चाय खत्म करके जब मैं वापस मुड़ा तो एक बच्चा मेरे पैर से टकरा गया। उसके हाथ में गुब्बारे थे—लाल, पीले, नीले। उसने माफी माँगने की जगह कहा, "अंकल, एक गुब्बारा ले लो ना!" मुझे हँसी आ गई। अंकल। कब हो गया मैं अंकल?
सैर खत्म करने से पहले मैंने सोचा, क्या मैं अपने शहर को सच में जानता हूँ? या बस उसी रास्ते को बार-बार दोहराता हूँ? शायद अगली बार किसी और गली में घुसूँ, कोई नई दुकान खोजूँ, या किसी अनजान से बात करूँ। शहर तो वही है, लेकिन नज़रिया बदलने से हर दिन नया हो सकता है। यही तो यात्रा का असली मज़ा है—बाहर की नहीं, भीतर की यात्रा।
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