आज का प्लान था Kashmiri Gate मेट्रो से Chandni Chowk तक पैदल — सीधा रास्ता, ज़्यादा से ज़्यादा तीन किलोमीटर। लेकिन मेट्रो से निकला तो Gate No. 3 से निकल आया था, जबकि नोटबुक में लिखा था Gate No. 1। दोनों के बीच की दूरी कोई पाँच सौ मीटर, और वो पाँच सौ मीटर एक अलग मोहल्ले में निकलते हैं। यानी पहला भटकाव तो तय था।
एक पुरानी तीन-मंज़िला इमारत की दीवार पर एक साइनबोर्ड था — "मेसर्स रामनाथ एंड सन्स, हार्डवेयर मर्चेंट्स, स्थापना 1961।" पेंट इतना उखड़ा हुआ था कि '1961' से पहले कुछ और भी लिखा हो सकता था। दुकान बंद थी, शटर पर ताला, लेकिन साइनबोर्ड अब भी टिका हुआ था — जैसे किसी ने हटने से मना कर दिया हो।
एक पुराने पीपल के नीचे एक छोटी सी थड़ी मिली। कुल्हड़ में चाय ली — मिट्टी की वो गंध जो भाप के साथ ऊपर आती है, उसे किसी और चीज़ से नहीं बदला जा सकता। चाय में अदरक थोड़ा ज़्यादा था, कड़वाहट भी थी, लेकिन पैरों को जब थकान लगने लगे तो कड़वी चाय भी ठीक लगती है।
गली में एक ऑटो वाला खड़ा था — मैंने बिना सोचे नमस्ते बोल दिया। उसने ऊपर से नीचे देखा, फिर बोला, "पहचाना नहीं।" मैं भी नहीं पहचानता था। हम दोनों थोड़ा असहज रहे। वो अपने ऑटो में वापस बैठ गया, मैं आगे बढ़ गया।
वापसी में एक ढकी हुई नाली के ऊपर बनी मिठाई की दुकान से गुज़रा — शीशे के पीछे बर्फी की परतें सजी थीं। नोटबुक में लिखा: "नाली के ऊपर मिठाई।" शायद यही इस शहर का तरीका है।
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