आज सोचा था कि Jama Masjid के गेट नंबर एक से निकलूँगा और Chawri Bazar मेट्रो तक पैदल जाऊँगा। सात-आठ...
आज सोचा था कि Jama Masjid के गेट नंबर एक से निकलूँगा और Chawri Bazar मेट्रो तक पैदल जाऊँगा। सात-आठ...
आज का इरादा था — Lal Qila मेट्रो से Delhi Gate तक पैदल, सीधी सड़क, बहुत दूर नहीं। पर गेट से निकलते...
आज का इरादा था — चाँदनी चौक मेट्रो से निकलकर पुराने बाज़ार की तरफ़ पैदल, फिर नली-वाली गली होते हुए...
आज का plan था Chandni Chowk मेट्रो से निकलकर Kashmere Gate तक पैदल जाना। दूरी ज़्यादा नहीं — तीन...
आज का इरादा था — लाल किला मेट्रो से चाँदनी चौक तक पैदल, बीच में जो भी आए। दूरी ज़्यादा नहीं, शायद...
आज का इरादा था कि चांदनी चौक मेट्रो से कश्मीरी गेट तक पैदल जाऊँगा — नक्शे पर डेढ़ किलोमीटर दिखा, मन में था कि जल्दी निपट जाएगा। निकले तो दस बजे, लेकिन गेट नंबर छह की जगह गेट नंबर एक से बाहर आ गए, जो बिल्कुल विपरीत दिशा में खुलता है। सड़क देखी, थोड़ा सोचा, गूगल खोला — पता चला हम जहाँ जाना था, उससे और दूर निकल आए हैं।
वापस मुड़े। एक पुरानी गली से घुसे जिसका नाम पता नहीं था। दीवारों पर कई परतों वाला पेंट था — नीचे लाल, ऊपर पीला, और सबसे ऊपर एक झुका हुआ बोर्ड जिस पर लिखा था "मेसर्स रामसहाय & सन्स, सन् 1971 से।" साल पढ़कर रुक गया। पचपन साल। शटर पर ताला था, लेकिन बोर्ड टिका हुआ था। शायद रामसहाय जी के बेटे-पोते शहर में कहीं और हैं। शायद नहीं हैं। मैं ज़्यादा देर सोचता रहा और पीछे से एक साइकिल वाले ने टिनटिनाया।
थोड़ा आगे एक थड़ी थी — छोटी सी, एक बुज़ुर्ग और एक स्टोव। चाय माँगी तो कुल्हड़ में मिली। इतनी गरम कि उँगलियाँ जलने की तरफ़ थीं। पहला घूँट कड़वा था, और मिट्टी की वो गंध जो कुल्हड़ में हमेशा होती है — वो अचानक कुछ याद दिला गई। कोई ख़ास याद नहीं, बस एक धुंधली सी छवि, और फिर गायब। बुज़ुर्ग ने पूछा कहाँ से हो, मैंने कहा दिल्ली से, उन्होंने कहा "यहाँ के नहीं लगते।" मैंने सहमति में सिर हिलाया।
कश्मीरी गेट पहुँचा तो पैर थोड़े नाराज़ थे। डेढ़ किलोमीटर के इरादे में चार किलोमीटर हो गए थे। गली की गलतियाँ भी हिसाब में जुड़ती हैं, यही पैदल चलने का सच है।
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