आज का रूट था कश्मीरी गेट से पुल मिठाई — सीधी लाइन पर, कागज़ पर। असलियत में, दो बार वही गली से वापस निकला जहाँ से घुसा था। मैप देख रहा था, पर शायद उल्टा पकड़े हुए था — स्क्रीन पर उत्तर था, मेरे पैर दक्षिण जा रहे थे। एक ऑटो वाले ने देखा, कुछ बोला नहीं, बस मुस्कुराया। काफ़ी था।
नालाबंद की तरफ़ जो सड़क उतरती है, उस पर एक पुरानी दुकान का बोर्ड है — आधा रंग उड़ा हुआ, बचे हुए हिस्से में लिखा था "जनरल स्टोर एवं..." और बाकी शब्द कब के मिट चुके। दुकानदार बाहर बैठे थे, मैंने बोर्ड की तरफ़ इशारा किया, वो बोले "हाँ, वही है।" शायद जवाब मेरे सवाल से भी पुराना था।
तीन-चौथाई रास्ते पर एक छोटी सी थड़ी मिली — एक बुज़ुर्ग, एक केतली, दो प्लास्टिक की कुर्सियाँ जिनमें से एक पर कोई बैठा था। चाय माँगी। कुल्हड़ में आई — मिट्टी की गंध पहले आती है, उसके बाद चाय। पहला घूँट थोड़ा कड़वा था, दूसरा ठीक। बुज़ुर्ग ने पूछा, "कहाँ जाना है?" मैंने बताया। उन्होंने सिर हिलाया जैसे कह रहे हों — ठीक है, बच्चे हैं।
पुल मिठाई के पास एक ढकी हुई नाली है जिसके ऊपर कुछ ठेले लगे हुए हैं। नीचे बहता पानी दिखता नहीं, सुनाई भी नहीं देता — पर पैर रखते वक़्त एहसास होता है कि ज़मीन थोड़ी खोखली है। शहर बहुत कुछ छुपा के चलता है।
वापसी में बस नहीं मिली, मेट्रो पकड़ी। गलत गेट से निकल आया — जो तरफ़ मुझे जाना था, वो दूसरी तरफ़ थी। फिर सड़क पार की, अंडरपास में उतरा, चढ़ा। कुल मिलाकर आज के चक्कर में कोई छह-सात किलोमीटर ज़्यादा हो गए। पैर ने शाम को बताया।
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