आज सुबह छह बजे निकला था पुराने शहर की गलियों में घूमने। सोचा था कि भीड़ से पहले उस इलाके की असली तस्वीर देखूंगा, लेकिन भूल गया कि गुरुवार को यहाँ सब्ज़ी मंडी लगती है। पहुंचते ही ठेलों की आवाज़ें, टमाटर-प्याज़ की महक, और लोगों की सौदेबाज़ी ने घेर लिया।
एक मोड़ पर खड़े होकर देख रहा था कि कैसे सुबह की धूप पुरानी हवेली की दीवार पर तिरछी पड़ रही है। तभी एक बुज़ुर्ग ने टोका, "भैया, फ़ोटो खींचनी है तो किनारे हो जाओ, रास्ता रोक रखा है।" मुस्कुराते हुए हटा। सही भी था—मैं पर्यटक की तरह खड़ा था बीच रास्ते में, जबकि यहाँ के लिए यह रोज़ की सुबह थी।
आगे बढ़ा तो एक छोटी सी गली में मुड़ गया, सोचा शॉर्टकट होगा। लेकिन पाँच मिनट बाद पता चला कि वो गली तो एक पुराने मंदिर के पिछवाड़े में जाकर ख़त्म हो गई। वापस मुड़ना पड़ा। अच्छा ही हुआ—उस गली में एक छोटी सी चाय की दुकान मिली जहाँ कुल्हड़ में चाय मिल रही थी। मिट्टी की वो हल्की सी खुशबू, चाय की भाप, और बगल में बैठे दो लोगों की राजनीति पर बहस—यह सब प्लान में नहीं था।
चाय पीते हुए सोच रहा था कि शहर में चलना एक तरह का संवाद है। तुम रास्ता चुनते हो, रास्ता तुम्हें कुछ दिखाता है। कभी-कभी ग़लत मोड़ सबसे दिलचस्प जगहें दिखा देते हैं। एक छोटा सा प्रयोग किया—अगली बार दाएं की बजाय बाएं मुड़ूंगा, देखता हूँ क्या मिलता है।
चायवाले ने चार रुपये वापस देते हुए पूछा, "नए हो क्या यहाँ?" मैंने कहा, "नहीं, बस देखने का तरीक़ा नया है।" उसने हंसकर सिर हिलाया।
यह भी अजीब बात है—हम अपने ही शहर में पर्यटक बन सकते हैं बस रास्ता बदलकर। कल शायद उसी बाज़ार से दूसरी गली में घुसूं। देखता हूँ कौन सी नई कहानी मिलती है।
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