आज सुबह की सैर पर निकला तो पुराने बाज़ार की गलियों में घूमने का मन हुआ। वहाँ की हवा में चाय की खुशबू और ताज़ी जलेबी की मिठास घुली हुई थी। एक दुकान के बाहर खड़े होकर मैंने देखा - एक बुजुर्ग दुकानदार अपने पुराने रेडियो पर सुबह के गाने सुन रहे थे। उनकी उंगलियाँ ताल पर थिरक रही थीं, जैसे पूरी दुनिया से बेखबर हों।
मैंने सोचा था कि मुख्य सड़क से जाऊँगा, लेकिन गलती से एक संकरी गली में मुड़ गया। वहाँ मुझे एक छोटा सा मंदिर मिला, जिसकी दीवारों पर पुरानी नक्काशी थी। यह गलती अच्छी रही - कभी-कभी रास्ता भटकना नई चीज़ें सिखा जाता है।
पास की चाय की दुकान पर एक आदमी अपने दोस्त से कह रहा था, "भाई, इस शहर को समझना हो तो पैदल चलो, गाड़ी में बैठकर तो बस इमारतें दिखती हैं।" मैं मुस्कुरा दिया - कितनी सही बात थी।
वापसी में मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया। हमेशा मैं तेज़ चलता हूँ, आज धीरे चला। फर्क यह हुआ कि मुझे दीवारों पर बने भित्तिचित्र दिखे, एक पेड़ की जड़ों का जाल दिखा जो फुटपाथ को तोड़कर बाहर आ गया था। धीरे चलने में अपनी ही दुनिया है।
एक मज़ेदार बात - एक कुत्ता मेरे पीछे-पीछे तीन गलियों तक आया, शायद उसे लगा मैं कहीं खाने की तलाश में जा रहा हूँ। जब मैं रुका तो वो भी रुक गया, जब मैं चला तो वो भी चल दिया। आखिर में उसे निराशा हाथ लगी!
अब सोच रहा हूँ - क्या हर गली की अपनी कहानी होती है? क्या मैं कल किसी और रास्ते से चलूँ और देखूँ कि वहाँ क्या मिलता है?
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