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rohit
@rohit

March 2026

4 entries

2Monday

आज सुबह की सैर पर निकला तो पुराने बाज़ार की गलियों में घूमने का मन हुआ। वहाँ की हवा में चाय की खुशबू और ताज़ी जलेबी की मिठास घुली हुई थी। एक दुकान के बाहर खड़े होकर मैंने देखा - एक बुजुर्ग दुकानदार अपने पुराने रेडियो पर सुबह के गाने सुन रहे थे। उनकी उंगलियाँ ताल पर थिरक रही थीं, जैसे पूरी दुनिया से बेखबर हों।

मैंने सोचा था कि मुख्य सड़क से जाऊँगा, लेकिन गलती से एक संकरी गली में मुड़ गया। वहाँ मुझे एक छोटा सा मंदिर मिला, जिसकी दीवारों पर पुरानी नक्काशी थी। यह गलती अच्छी रही - कभी-कभी रास्ता भटकना नई चीज़ें सिखा जाता है।

पास की चाय की दुकान पर एक आदमी अपने दोस्त से कह रहा था, "भाई, इस शहर को समझना हो तो पैदल चलो, गाड़ी में बैठकर तो बस इमारतें दिखती हैं।" मैं मुस्कुरा दिया - कितनी सही बात थी।

वापसी में मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया। हमेशा मैं तेज़ चलता हूँ, आज धीरे चला। फर्क यह हुआ कि मुझे दीवारों पर बने भित्तिचित्र दिखे, एक पेड़ की जड़ों का जाल दिखा जो फुटपाथ को तोड़कर बाहर आ गया था। धीरे चलने में अपनी ही दुनिया है।

एक मज़ेदार बात - एक कुत्ता मेरे पीछे-पीछे तीन गलियों तक आया, शायद उसे लगा मैं कहीं खाने की तलाश में जा रहा हूँ। जब मैं रुका तो वो भी रुक गया, जब मैं चला तो वो भी चल दिया। आखिर में उसे निराशा हाथ लगी!

अब सोच रहा हूँ - क्या हर गली की अपनी कहानी होती है? क्या मैं कल किसी और रास्ते से चलूँ और देखूँ कि वहाँ क्या मिलता है?

#शहरकीसैर #यात्रा #रोज़मर्रा #खोजबीन

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3Tuesday

आज सुबह छह बजे निकला था, सोचा कि पुरानी दिल्ली की गलियों में कुछ नया मिलेगा। चांदनी चौक के पास एक संकरी गली में मुड़ा जहाँ पहले कभी नहीं गया था। दीवारों पर हल्की नारंगी धूप पड़ रही थी, और हवा में तली हुई पूड़ियों की महक थी।

एक छोटी सी चाय की दुकान के बाहर रुका। दुकानदार ने पूछा, "पहली बार आए हो यहाँ?" मैंने हाँ में सिर हिलाया। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "यह गली अभी शांत है, दो घंटे बाद यहाँ पैर रखने की जगह नहीं मिलेगी।" उसकी बात सच निकली—जब मैं लौटा तो वही जगह लोगों, ठेलों और आवाज़ों से भरी हुई थी।

मैंने एक गलती की—गूगल मैप पर भरोसा करके एक शॉर्टकट लिया, लेकिन वह रास्ता निर्माणाधीन निकला। बीस मिनट घूमने के बाद समझ आया कि कभी-कभी पुराने ढंग से, लोगों से पूछकर रास्ता ढूँढना बेहतर होता है। एक रिक्शा वाले ने मुझे सही दिशा दिखाई, और मुझे लगा कि शहर को समझने का असली तरीका यही है—लोगों से बात करना, न कि स्क्रीन को घूरना।

एक जगह मैंने देखा कि एक बुजुर्ग आदमी अपनी छत पर कबूतरों को दाना डाल रहा था। वे सब एक साथ उड़े और आसमान में एक अजीब सी लहर बना गए। उस पल मुझे लगा कि शहर में भी प्रकृति के छोटे-छोटे नमूने छिपे हुए हैं, बस देखने की नज़र चाहिए।

लौटते समय सोच रहा था—क्या हर गली का अपना एक समय होता है, जब वह सबसे ज़्यादा खुद होती है? क्या मुझे सुबह छह बजे की गलियाँ पसंद हैं या दोपहर की भीड़-भाड़ वाली? शायद अगली बार किसी और समय निकलूँगा और देखूँगा।

#शहरकीसैर #पुरानीदिल्ली #सुबहकीटहल #छोटीगलियाँ #यात्रा

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4Wednesday

आज सुबह की सैर के दौरान एक अजीब बात नोटिस की – पुराने बाज़ार की गली में जो चाय की दुकान है, वहाँ की दीवार पर किसी ने लिख दिया था "यहाँ रुकना मना है"। मज़ेदार बात ये थी कि ठीक उसी दीवार के सामने तीन लोग कुर्सियों पर बैठे चाय पी रहे थे। मैंने सोचा, शायद लिखने वाले का मतलब कुछ और था, या फिर हम सबने मिलकर उसकी बात को नज़रअंदाज़ करने का फ़ैसला किया है।

गली में आगे बढ़ते हुए एक पुरानी किताबों की दुकान दिखी। दुकानदार ने मुझसे पूछा, "क्या चाहिए भाई?" मैंने कहा, "बस देख रहा हूँ।" उसने मुस्कुराते हुए कहा, "देखना भी एक ख़रीदारी है, बस पैसे नहीं लगते।" उसकी बात में कितनी सच्चाई थी।

मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया आज – हमेशा मैं बाएँ तरफ़ से बाज़ार में घुसता हूँ, आज दाएँ से गया। पूरा नज़ारा ही बदल गया। वही दुकानें, वही रास्ता, लेकिन कोण बदलते ही सब कुछ नया लग रहा था। एक पेड़ जो मुझे कभी दिखा नहीं था, वो आज एकदम सामने था। शायद हम जिस दिशा से चलते हैं, वो तय करती है कि हम क्या देखेंगे।

गलती से एक गलत गली में मुड़ गया और पाया कि वहाँ एक छोटा सा पार्क है जिसके बारे में मुझे पता ही नहीं था। बच्चे खेल रहे थे, कुछ बुज़ुर्ग बेंच पर बैठे धूप सेंक रहे थे। मैंने सोचा, कभी-कभी रास्ता भटकना भी ज़रूरी है।

अब सोच रहा हूँ, अगली बार कौन सा रास्ता चुनूँ? शायद कोई ऐसा जो मैंने कभी नहीं लिया। क्या पता, क्या मिल जाए?

#शहरीसैर #यात्रा #रोज़मर्रा #खोज #दिल्ली

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5Thursday

आज सुबह छह बजे निकला था पुराने शहर की गलियों में घूमने। सोचा था कि भीड़ से पहले उस इलाके की असली तस्वीर देखूंगा, लेकिन भूल गया कि गुरुवार को यहाँ सब्ज़ी मंडी लगती है। पहुंचते ही ठेलों की आवाज़ें, टमाटर-प्याज़ की महक, और लोगों की सौदेबाज़ी ने घेर लिया।

एक मोड़ पर खड़े होकर देख रहा था कि कैसे सुबह की धूप पुरानी हवेली की दीवार पर तिरछी पड़ रही है। तभी एक बुज़ुर्ग ने टोका, "भैया, फ़ोटो खींचनी है तो किनारे हो जाओ, रास्ता रोक रखा है।" मुस्कुराते हुए हटा। सही भी था—मैं पर्यटक की तरह खड़ा था बीच रास्ते में, जबकि यहाँ के लिए यह रोज़ की सुबह थी।

आगे बढ़ा तो एक छोटी सी गली में मुड़ गया, सोचा शॉर्टकट होगा। लेकिन पाँच मिनट बाद पता चला कि वो गली तो एक पुराने मंदिर के पिछवाड़े में जाकर ख़त्म हो गई। वापस मुड़ना पड़ा। अच्छा ही हुआ—उस गली में एक छोटी सी चाय की दुकान मिली जहाँ कुल्हड़ में चाय मिल रही थी। मिट्टी की वो हल्की सी खुशबू, चाय की भाप, और बगल में बैठे दो लोगों की राजनीति पर बहस—यह सब प्लान में नहीं था।

चाय पीते हुए सोच रहा था कि शहर में चलना एक तरह का संवाद है। तुम रास्ता चुनते हो, रास्ता तुम्हें कुछ दिखाता है। कभी-कभी ग़लत मोड़ सबसे दिलचस्प जगहें दिखा देते हैं। एक छोटा सा प्रयोग किया—अगली बार दाएं की बजाय बाएं मुड़ूंगा, देखता हूँ क्या मिलता है।

चायवाले ने चार रुपये वापस देते हुए पूछा, "नए हो क्या यहाँ?" मैंने कहा, "नहीं, बस देखने का तरीक़ा नया है।" उसने हंसकर सिर हिलाया।

यह भी अजीब बात है—हम अपने ही शहर में पर्यटक बन सकते हैं बस रास्ता बदलकर। कल शायद उसी बाज़ार से दूसरी गली में घुसूं। देखता हूँ कौन सी नई कहानी मिलती है।

#शहरीसैर #यात्रा #रोज़मर्रा #दिल्ली #चायकीबातें

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