आज सुबह छह बजे घर से निकला तो गली के नुक्कड़ पर चाय वाले भैया पहले से ही अपना स्टॉल लगा चुके थे। उनकी केतली से उठती भाप सुबह की ठंडी हवा में एक अजीब सा नृत्य कर रही थी। मैंने सोचा था कि आज पुराने बाजार तक पैदल चलूंगा, फोटो के लिए नहीं बल्कि सिर्फ देखने के लिए—बिना किसी योजना के, बिना किसी मंजिल के।
पुराने शहर की गलियां सुबह एक अलग ही रूप में होती हैं। दुकानों के शटर खुलने की आवाज़, सड़क पर पानी के छिड़काव की गंध, और कहीं दूर से आती अज़ान की गूंज—ये सब मिलकर एक ऐसा संगीत बनाते हैं जो दिन में कभी नहीं सुनाई देता। मैं एक जूते की दुकान के सामने रुका जहां मालिक अपने बेटे को समझा रहे थे, "बेटा, ग्राहक को पहले बैठाओ, फिर जूते दिखाओ। खड़े-खड़े कोई नहीं खरीदता।" इतनी साधारण बात, लेकिन व्यापार का एक अनमोल पाठ।
आगे बढ़ते हुए मैंने एक गलती की—गूगल मैप्स पर भरोसा करके एक शॉर्टकट लिया जो निकला तो गया, पर एक ऐसी संकरी गली में से जहां दोनों तरफ पुरानी साइकिलें, गमले, और न जाने क्या-क्या रखा था। बीच में एक जगह तो मुझे बगल से चलना पड़ा। लेकिन उसी गली में मैंने एक दरवाज़े पर सबसे खूबसूरत नीले रंग की टाइल्स देखीं—शायद पुर्तगाली या मुगल प्रभाव, कौन जाने। अगर मैं मुख्य सड़क से गया होता तो यह खूबसूरती कभी नहीं देखता।
बाजार के चौक पर पहुंचा तो एक बुजुर्ग सब्जी वाली हरी मिर्च तोल रही थीं और हर मिर्च को उंगलियों से छूकर जांच रही थीं जैसे वो कोई कीमती रत्न हो। उनके चेहरे पर संतोष का वो भाव था जो शायद हमें ऑनलाइन शॉपिंग में कभी नहीं मिलेगा। मुझे लगा, धीमा होना भी एक कला है जो हम भूलते जा रहे हैं।
क्या शहर हमें तेज़ बनाते हैं, या हम शहरों को तेज़ बना देते हैं? वापसी में यही सोचता रहा। और सोच रहा हूं कि अगले हफ्ते किसी दूसरे इलाके में चलूं—शायद नदी के किनारे वाली कॉलोनी, जहां पेड़ ज्यादा हैं और समय थोड़ा धीमा चलता है।
#सुबह_की_सैर #शहरी_जीवन #यात्रा #रोज़मर्रा #भारतीय_बाज़ार