आज शुक्रवार की सुबह कुछ अलग थी। सोचा था कि नए इलाके की गलियों में घूमूंगा, पर पैर अपने आप पुराने बाज़ार की तरफ मुड़ गए। शायद आदत है, या फिर वो चाय की दुकान जो कोने पर है।
रास्ते में एक छोटी सी गलती हो गई। गूगल मैप पर भरोसा करके एक शॉर्टकट लिया, और पता चला कि वो रास्ता तीन साल पहले बंद हो चुका था। अब वहां एक नई इमारत खड़ी है। सबक मिला: कभी-कभी पुराने रास्ते ही सही होते हैं, भले ही लंबे हों।
बाज़ार में रंगों की एक अजीब सी सिम्फनी थी। लाल टमाटर, हरी मिर्च, और पीले आम - सब एक साथ। हवा में अदरक और धनिये की खुशबू थी, और बीच-बीच में चाय की भाप। एक दुकानदार अपने ग्राहक से कह रहा था, "भैया, आज के आम परसों के से बेहतर हैं, बस दो दिन और रुक जाओ तो और मीठे हो जाएंगे।" मुझे हंसी आ गई - ये कैसी सेल्स पिच है जो ग्राहक को न खरीदने के लिए कहे?
फिर मैंने एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट किया। हमेशा उसी चाय की दुकान पर जाता हूं, पर आज बगल वाली दुकान पर गया। चाय का स्वाद? लगभग वही, पर कप थोड़ा छोटा था। कभी-कभी बदलाव सिर्फ बदलाव के लिए होता है, बेहतरी के लिए नहीं।
वापसी में सूरज की रोशनी इमारतों के बीच से छनकर आ रही थी। वो सुनहरी धूप जो सिर्फ शाम को मिलती है। सोच रहा था कि अगर हर रोज़ एक नया रास्ता लूं, तो कितने दिनों में पूरे शहर को जान पाऊंगा?
शायद कुछ रास्ते कभी पूरी तरह जाने नहीं जा सकते। और शायद यही मज़ा है।
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