आज सुबह पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते हुए एक अजीब बात देखी। एक छोटी सी चाय की दुकान के बाहर, तीन अलग-अलग उम्र के लोग एक ही अखबार पढ़ रहे थे—एक बुजुर्ग चश्मा लगाए पहले पन्ने पर, एक युवक बीच के खेल वाले सेक्शन पर, और एक छोटा बच्चा कार्टून वाले हिस्से को घूरते हुए। तीनों की गर्दन एक अजीब सी लय में हिल रही थी, जैसे किसी अदृश्य संगीत पर नाच रहे हों।
मैंने दुकानदार से पूछा, "भाई साहब, ये तीनों रोज़ आते हैं क्या?"
उसने मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ, ये तो हमारे 'फ्री लाइब्रेरी मेंबर्स' हैं। अखबार मैं खरीदता हूँ, पढ़ते ये हैं।"
चाय की चुस्कियों के बीच मैंने महसूस किया कि शहर में चलना सिर्फ़ पैरों की कसरत नहीं, बल्कि छोटी-छोटी मानवीय आदतों का संग्रहालय देखना है। हर मोड़ पर कोई न कोई अनकहा नियम चल रहा होता है—कौन कहाँ खड़ा होगा, कौन किसे रास्ता देगा, कौन किस वक्त चाय पिएगा।
गलियों में तेल और मसालों की महक इतनी तेज़ थी कि मेरा पेट बोलने लगा। मैंने एक गलती की—खाली पेट परांठे वाली गली में घुस गया। अगली बार पहले नाश्ता, फिर सैर का नियम बनाऊंगा। वरना हर दुकान से आती महक मुझे अपराधी की तरह घूरने पर मजबूर कर देती है।
चलते-चलते एक पुराने मंदिर के सामने रुक गया। वहाँ एक औरत फूल बेच रही थी, और उसकी आवाज़ में एक अजीब सी धुन थी—"लो जी, ताज़े फूल, भगवान भी खुश, आप भी खुश!" मैंने सोचा, शायद असली यात्रा यही है—सड़कों पर बिखरे इन छोटे-छोटे गीतों को सुनना।
वापस लौटते हुए मन में एक सवाल आया: क्या मैं कल भी इसी रास्ते से गुज़रूँगा, या कोई नई गली खोजूँगा? शायद दोनों। क्योंकि शहर तो वही रहता है, लेकिन हर दिन उसका चेहरा बदल जाता है।
#शहरीसैर #दिल्लीदर्शन #रोज़मर्राकीकहानियाँ #यात्रा