आज सुबह पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते हुए एक अजीब बात नोटिस की। चांदनी चौक के पास जहां हमेशा भीड़ रहती है, वहां एक छोटी सी गली में सन्नाटा था। बस एक बुज़ुर्ग दुकानदार अपनी चाय की दुकान खोल रहा था। उसने मुझे देखा तो मुस्कुराकर पूछा, "इतनी सुबह भटक गए क्या?" मैंने हंसकर कहा, "नहीं चाचा, खो गया हूं।" उसने चाय का गिलास बढ़ाया और बोला, "खोने वाले ही तो असली रास्ते खोजते हैं।"
चाय की भाप और तली हुई जलेबी की मीठी महक हवा में तैर रही थी। पुरानी दीवारों पर सुबह की धूप तिरछी पड़ रही थी, जिससे पीली ईंटों का रंग सोने जैसा चमक रहा था। मैंने अपना फ़ोन निकाला तस्वीर लेने के लिए, लेकिन फिर सोचा - क्या हर चीज़ को कैद करना ज़रूरी है? कभी-कभी कुछ पलों को बस जी लेना चाहिए।
गली के आखिर में एक छोटा मंदिर था जहां एक महिला फूल चढ़ा रही थी। उसके पैरों में पायल की आवाज़ गूंज रही थी। मैं थोड़ी देर वहीं बैठ गया, सिर्फ सुनते हुए - घंटियां, दूर से आती गाड़ियों की आवाज़, किसी बच्चे की हंसी। शहर में इतना शोर होता है कि हम भूल जाते हैं कि चुप्पी भी एक तरह का संगीत है।
वापस लौटते हुए मुझे एहसास हुआ कि मैं हमेशा बड़ी-बड़ी जगहों के बारे में सोचता हूं - पहाड़, समुद्र, विदेश। लेकिन असली यात्राएं तो अपने ही शहर की उन गलियों में छिपी हैं जहां हम कभी नहीं मुड़ते। आज की छोटी भटकन ने मुझे सिखाया कि रास्ता भटकना गलती नहीं, एक मौका है।
कल से एक नया प्रयोग करूंगा - हर दिन एक अलग गली, एक नया मोड़। देखते हैं अपना ही शहर कितने चेहरे दिखाता है।
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