आज सुबह पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते हुए एक अजीब बात नोटिस की। चांदनी चौक के पास एक छोटी सी गली में, जहां मसालों की दुकानें हैं, वहां की आवाज़ें बिल्कुल अलग थीं। धनिये की खुशबू और लाल मिर्च की तीखी गंध हवा में घुली हुई थी, लेकिन जो चीज़ मुझे रोक ली वह थी एक बूढ़े दुकानदार का गाना। वह पुराना बॉलीवुड गाना गुनगुना रहे थे जबकि मसाले तौल रहे थे। मैंने सोचा, शहर की आत्मा कभी-कभी इन्हीं छोटे पलों में छिपी होती है।
मैंने अपना कैमरा निकाला, लेकिन एक गलती हो गई। मैं इतने करीब चला गया कि मेरा बैग मसाले की एक छोटी सी टोकरी से टकरा गया। हल्दी का एक छोटा बादल हवा में उड़ा और मेरी काली टी-शर्ट पर पीले धब्बे पड़ गए। दुकानदार हंसे, "बेटा, यह शहर तुम्हें अपना रंग दे रहा है!" मैंने भी हंस कर माफी मांगी। सीख मिली – शहर को देखने के लिए थोड़ा फासला ज़रूरी है, लेकिन जीने के लिए थोड़ा टकराना भी।
आगे बढ़ते हुए एक पुराने हवेली के बाहर रुका। दीवार पर नीली और सफेद टाइलों का काम था, जो शायद सौ साल पुराना होगा। धूप की एक पतली किरण उन पर पड़ रही थी, और पैटर्न इतना सुंदर लग रहा था कि मैं पांच मिनट तक वहीं खड़ा रहा। एक छोटा लड़का साइकिल पर निकला और पूछा, "क्या ढूंढ रहे हो?" मैंने कहा, "बस देख रहा हूं।" उसने अजीब नज़रों से देखा और चला गया। शायद उसके लिए यह रोज़ की दीवार है, मेरे लिए एक कहानी।
वापसी में सोच रहा था कि यही तो फर्क है – यात्रा करने वाले और वहां रहने वाले के बीच। हम जो चीज़ें रोज़ देखते हैं, वो अदृश्य हो जाती हैं। लेकिन अगर हम थोड़ा धीमा चलें, थोड़ा गौर से देखें, तो हर गली में कुछ नया छिपा है। कल शायद दूसरे इलाके में जाऊंगा – सोच रहा हूं कि वहां की दीवारें क्या कहानी सुनाएंगी?
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