आज सुबह पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते हुए एक अजीब सी बात नज़र आई। चांदनी चौक के पास एक छोटी सी गली में, जहां आमतौर पर सिर्फ़ ठेलेवाले और दुकानदार होते हैं, एक बुज़ुर्ग आदमी कबूतरों को दाना खिला रहा था। लेकिन दिलचस्प यह था कि वो हर कबूतर को अलग-अलग नाम से बुला रहा था - "आ जा बसंती", "इधर आ राजा", "तू पीछे हट गुलाबो"। मैं रुक गया और देखता रहा। शहर की भागदौड़ में यह छोटा सा दृश्य किसी कविता जैसा लग रहा था।
गली की दीवारों से आ रही पुरानी ईंटों की महक और पास की चाय की दुकान से उठती अदरक वाली चाय की खुशबू - यह combination कुछ खास था। मैंने सोचा था कि आज सिर्फ़ तस्वीरें लूंगा, लेकिन ये गलियां हमेशा कुछ न कुछ सिखा ही देती हैं। तस्वीर लेने में इतना मशगूल था कि एक ठेले से टकरा गया - ठेलेवाले ने हंसकर कहा, "साहब, फ़ोन नीचे रखकर भी तो चल सकते हो।" बिल्कुल सही बात थी।
मैंने एक छोटा सा experiment किया आज। आमतौर पर मैं हमेशा बड़ी सड़कों से होते हुए main मार्केट की तरफ़ जाता हूं, लेकिन आज जानबूझकर सबसे छोटी, सबसे संकरी गली चुनी। और पता है क्या मिला? एक 70 साल पुराना समोसे की दुकान, जिसके बारे में किसी travel blog पर नहीं लिखा। बस, बुज़ुर्गों की याद में बसा एक ज़ायका।
यहां की असली ज़िंदगी बड़ी सड़कों पर नहीं, इन्हीं छोटी-छोटी गलियों में छुपी है। जहां लोग एक-दूसरे को जानते हैं, जहां हर दुकानदार तुम्हारी पसंद जानता है, जहां समय थोड़ा धीमा चलता है।
कल सोच रहा हूं कि पुरानी दिल्ली के और किन हिस्सों में ऐसी hidden stories छुपी होंगी? शायद Jama Masjid के पीछे की गलियों में? या फिर किसी और ज़ोन में जहां tourist नहीं जाते? हर शहर एक किताब है - बस पन्ने पलटने की ज़रूरत है।
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