आज सुबह छह बजे चांदनी चौक की गलियों में घूमते हुए एक अजीब बात नोटिस की। जैसे ही सूरज की पहली किरणें पुरानी हवेलियों की दीवारों पर पड़ीं, वहां की नमी से एक खास तरह की मिट्टी और पुराने पत्थर की खुशबू उठने लगी। यह वही खुशबू है जो मुझे हर बार याद दिलाती है कि दिल्ली कितनी पुरानी है, और साथ ही कितनी ज़िंदा।
एक छोटी सी दुकान के बाहर खड़े चाय वाले भैया से बात हुई। मैंने पूछा, "भैया, आप कितने बजे से यहां हैं?" उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, जब तुम सो रहे थे, तब से। चार बजे से यहीं हूं।" मैंने सोचा कि मैं तो खुद को एक्सप्लोरर समझता हूं, लेकिन असली एक्सप्लोरर तो ये लोग हैं जो रोज़ इस शहर को जगाते हैं।
मैंने एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट किया आज। हमेशा मैं मेन रोड से चलता हूं, लेकिन आज मैंने उसी रास्ते की साइड वाली एक और भी पतली गली चुनी। और क्या मिला? एक छोटा सा मंदिर, जहां तीन-चार बुज़ुर्ग महिलाएं भजन गा रही थीं। उनकी आवाज़ें इतनी शांत और मधुर थीं कि मैं पांच मिनट वहीं खड़ा रहा, बस सुनता रहा।
एक मज़ेदार बात – मैं अपना कैमरा घर भूल आया था। पहले तो बहुत खीज हुई, फिर सोचा कि शायद यह अच्छा ही है। आज मैंने सिर्फ आंखों से देखा, दिल से महसूस किया, और दिमाग में बसाया। हर चीज़ को कैद करने की ज़रूरत नहीं है; कुछ को बस जीना चाहिए।
वापस आते हुए सोच रहा था – क्या मैं कल किसी और पुरानी गली का रुख करूं? शायद पहाड़गंज या फिर पुरानी दिल्ली के किसी और कोने की तरफ? शहर अभी भी इतने राज़ छुपाए बैठा है।
#शहरीसैर #दिल्ली #सुबह #यात्रा #गलियां