आज सुबह की सैर के दौरान शहर के पुराने बाज़ार से गुज़रा। सूरज अभी पूरी तरह नहीं निकला था, लेकिन दुकानों की शटर खुलने की आवाज़ें गूंज रही थीं - धड़ाम, धड़ाम, एक लय में जैसे शहर की सुबह का अपना संगीत हो। चाय की दुकान से आती महक ने मुझे रोक लिया।
दुकान के बाहर खड़े होकर चाय पीते हुए एक बुज़ुर्ग साहब बोले, "भाई, रोज़ सुबह यहीं खड़े दिखते हो। क्या ढूंढते रहते हो इन गलियों में?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "कुछ नहीं काका, बस शहर को सुनने की कोशिश करता हूं।" उन्होंने सिर हिलाया जैसे मुझे थोड़ा पागल समझ लिया हो, लेकिन प्यार से।
मैंने आज एक छोटा सा प्रयोग किया - हमेशा मैं तेज़ क़दमों से चलता हूं, लेकिन आज जानबूझकर धीरे चला। पता चला कि जब आप धीरे चलते हैं तो दुनिया अलग दिखती है। दीवारों पर लगे पुराने पोस्टर, सीढ़ियों पर बैठी बिल्ली, खिड़की से झांकते गमलों की रंगीनियां - ये सब पहली बार देखा जैसे।
एक दुकान के बाहर ताज़ा कटे आम की ख़ुशबू थी। मार्च में आम? थोड़ा अजीब लगा, पर फिर याद आया - मौसम अब पुराने कैलेंडर नहीं मानता। यह भी शहर के बदलते चेहरे का एक हिस्सा है।
सबसे मज़ेदार बात यह रही - एक छोटे से गली के मोड़ पर एक कुत्ता बैठा था, बिल्कुल बीच में, जैसे राजा हो और सब को रास्ता देना उसका हक़। सब लोग बड़े आराम से उसके इर्द-गिर्द से गुज़र रहे थे। किसी ने उसे हटाने की कोशिश भी नहीं की। शायद यही है असली शहर का स्वभाव - सबके लिए जगह।
लौटते समय सोच रहा था - क्या धीरे चलना हमेशा अपनाऊं? या फिर हर रोज़ एक नया तरीक़ा आज़माऊं चलने का?
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