आज सुबह पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते हुए एक अजीब सी बात देखी। चांदनी चौक के पास एक छोटी सी गली में, जहां सुबह की धूप बमुश्किल पहुंचती है, एक बुजुर्ग दुकानदार अपनी चाय की दुकान के बाहर तुलसी का पौधा सहला रहा था। मैंने पूछा, "यहां धूप भी नहीं आती, फिर भी पौधा इतना हरा कैसे है?" उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटे, प्यार से बात करो तो पेड़-पौधे भी सुनते हैं।"
मैं आगे बढ़ा तो एहसास हुआ कि मैं गलत रास्ते पर आ गया हूं। गूगल मैप्स ने मुझे किसी और दिशा में भेज दिया था, लेकिन यह गलती न होती तो शायद वो चाय की दुकान, वो बुजुर्ग, और उनकी बात कभी न मिलती। कभी-कभी भटकना भी ज़रूरी होता है।
गली के मोड़ पर पराठों की खुशबू इतनी तेज थी कि मेरे पैर खुद-ब-खुद रुक गए। एक छोटी सी दुकान, धुएं से भरी, लेकिन वहां का आलू पराठा—मक्खन की परत के साथ—इतना परफेक्ट था कि मैंने सोचा, "क्या मैं यहां रोज़ आ सकता हूं?"
वापसी में मैंने एक पुराने किताबों की दुकान में झांका। धूल भरी अलमारियों पर एक किताब मिली—"दिल्ली की भूली-बिसरी गलियां।" पन्ने पलटते हुए लगा कि मैं जिस गली में अभी था, उसका ज़िक्र भी शायद इसमें हो।
अब सोच रहा हूं, क्या अगली बार मैं इस किताब को लेकर उन्हीं गलियों में चलूं? शायद हर कोने की एक पुरानी कहानी है, जो सिर्फ इंतज़ार कर रही है कि कोई उसे सुने।
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