आज का इरादा था कि कश्मीरी गेट से लाल क़िला तक पैदल जाऊँगा — मेट्रो वाली लाइन के नीचे-नीचे, सड़क...
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आज का इरादा था कि कश्मीरी गेट से लाल क़िला तक पैदल जाऊँगा — मेट्रो वाली लाइन के नीचे-नीचे, सड़क...
आज सोचा था कि Jama Masjid के गेट नंबर एक से निकलूँगा और Chawri Bazar मेट्रो तक पैदल जाऊँगा। सात-आठ...
आज का इरादा था — Lal Qila मेट्रो से Delhi Gate तक पैदल, सीधी सड़क, बहुत दूर नहीं। पर गेट से निकलते...
आज का इरादा था — चाँदनी चौक मेट्रो से निकलकर पुराने बाज़ार की तरफ़ पैदल, फिर नली-वाली गली होते हुए...
आज का plan था Chandni Chowk मेट्रो से निकलकर Kashmere Gate तक पैदल जाना। दूरी ज़्यादा नहीं — तीन...
सुबह बाहर निकला तो सड़क के किनारे एक पुराना दूधवाला अपनी साइकिल पर दूध की कैन लेकर निकल रहा था। घंटी की आवाज़ सुनकर कुछ बच्चे दौड़ते हुए आए, और वह मुस्कुराकर उन्हें देखने लगा। मैंने सोचा कि आज के ज़माने में ऐसे दृश्य कितने दुर्लभ हो गए हैं—ज़्यादातर लोग अब ऑनलाइन ऑर्डर करते हैं, दरवाज़े तक डिलीवरी चाहते हैं। पर यहाँ, इस गली में, समय थोड़ा धीमा चलता है।
आगे बढ़ते हुए मैं उस पार्क के पास पहुँचा जहाँ रोज़ सुबह कुछ बुज़ुर्ग लोग योग करते हैं। एक बुजुर्ग सज्जन ने मुझसे पूछा, "बेटा, तुम रोज़ इधर से निकलते हो, कभी रुककर बैठते क्यों नहीं?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "अगली बार ज़रूर।" पर सच तो यह है कि हम अक्सर चलते रहते हैं, बिना रुके, बिना सोचे कि कहाँ जा रहे हैं। शायद कभी-कभी रुकना भी ज़रूरी है।
रास्ते में एक छोटी दुकान दिखी जहाँ ताज़ी चाय की महक आ रही थी। मैंने एक कप लिया और दुकानदार से पूछा, "आप यहाँ कब से हैं?" उसने कहा, "तीस साल से।" मुझे हैरानी हुई—तीस साल एक ही जगह! मैं तो हर कुछ सालों में शहर बदल लेता हूँ। उसने कहा, "यहाँ हर रोज़ नए चेहरे आते हैं, पर कुछ पुराने ग्राहक अभी भी आते हैं।" यह सुनकर मुझे लगा कि शायद स्थिरता में भी एक अलग तरह की यात्रा होती है।
चाय पीते हुए मैंने ग़ौर किया कि सड़क के किनारे एक पुराना पेड़ है, जिसकी छाया में लोग अक्सर बैठते हैं। एक औरत अपने बच्चे को वहाँ झूला झुला रही थी। पेड़ की छाल पर किसी ने नाम लिखा हुआ था—"राज + मीना, 1998।" मुझे सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि यह पेड़ कितनी कहानियों का गवाह रहा होगा। हम सब कुछ समय के लिए यहाँ होते हैं, पर कुछ निशान छोड़ जाते हैं।
मैं वापस घर की ओर चल पड़ा, सोचते हुए कि शहर में चलना सिर्फ़ एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं है—यह देखने, सुनने, और महसूस करने का एक तरीक़ा है। कल फिर निकलूँगा, शायद किसी और रास्ते से, शायद किसी और दुकान पर चाय पिऊँगा। पर एक बात तय है—हर दिन कुछ नया सिखाता है, अगर हम ध्यान दें तो।
क्या हम अपनी रोज़मर्रा की यात्राओं में वाक़ई ध्यान देते हैं, या बस आदत में चलते रहते हैं?
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