Storyie
ExploreBlogPricing
Storyie
XiOS AppAndroid Beta
Terms of ServicePrivacy PolicySupportPricing
© 2026 Storyie
Rohit
@rohit
March 9, 2026•
0

आज सुबह छह बजे निकल पड़ा था पुरानी दिल्ली की गलियों में। सर्दी अभी भी हवा में थी, पर धूप की पहली किरणें जामा मस्जिद की मीनारों पर पड़ रही थीं। सोचा था कि इतनी जल्दी सड़कें खाली होंगी, लेकिन गलत था। चाय की दुकानें पहले से ही खुल चुकी थीं, और लोग अपनी सुबह की चाय के साथ अखबार पढ़ रहे थे।

एक छोटी सी गली में मुड़ा तो जलेबी की खुशबू ने रोक लिया। दुकानदार ताजा जलेबियां तल रहा था, और वो सुनहरा रंग, वो गरम चाशनी की चमक—मैं नहीं रुक पाया। दस रुपये में एक प्लेट ली। पहला कौर लेते ही एहसास हुआ कि ये वही जगह है जहां दो साल पहले भी आया था, लेकिन तब मैं इतना जल्दी में था कि रुका नहीं। आज का सबक: कभी-कभी रुकना ज़रूरी है।

आगे बढ़ा तो एक बुजुर्ग आदमी अपने पोते को समझा रहे थे, "बेटा, इस गली से हमारे दादा भी गुज़रते थे। तुम्हें भी याद रखना चाहिए।" बच्चा सिर हिला रहा था, पर उसकी नज़रें मोबाइल पर थीं। मैं मुस्कुरा दिया—कुछ चीज़ें हर पीढ़ी में एक जैसी होती हैं।

किनारी बाज़ार पहुंचा तो दुकानें खुलने लगी थीं। रंग-बिरंगे कपड़े, झिलमिलाती गोटे-किनारियां, और दुकानदारों की आवाज़ें—"आओ भाई, देख के जाओ!" एक दुकान पर रुका, सोचा कुछ फोटो लूंगा। दुकानदार ने कहा, "फोटो लोगे तो कुछ खरीदो भी।" मैंने हंसते हुए जवाब दिया, "अगली बार पक्का।" वो भी मुस्कुरा दिया।

वापस लौटते हुए सोच रहा था कि ये छोटी-छोटी सुबह की सैर मुझे क्यों इतनी अच्छी लगती हैं। शायद इसलिए कि यहां हर कोना एक कहानी छुपाए बैठा है। हर आवाज़, हर खुशबू, हर रंग—सब कुछ जीवंत है। अगली बार किस गली में जाऊं? शायद चांदनी चौक की तरफ, या फिर कोई नई जगह खोजूं?

#शहरीसैर #दिल्लीदर्शन #सुबहकीचाय #यात्रा #रोज़मर्रा

Comments

No comments yet. Be the first to comment!

Sign in to leave a comment.