Storyie
ExploreBlogPricing
Storyie
XiOS AppAndroid Beta
Terms of ServicePrivacy PolicySupportPricing
© 2026 Storyie
Rohit
@rohit
March 21, 2026•
0

आज सुबह छह बजे निकला था, सोचा था कि शनिवार की भीड़ से पहले पुराने शहर के उन गलियों में घूम आऊं जो हफ्ते भर बंद पड़ी दुकानों की वजह से अधूरी रह जाती हैं। लेकिन भाई, दिल्ली कभी सोती नहीं। छह बजे भी चाय की दुकान पर तीन-चार लोग खड़े थे, और एक बुजुर्ग अंकल अपनी साइकिल पर अखबारों का गट्ठर लिए भागे जा रहे थे। हवा में अभी ठंडक थी, लेकिन वो मीठी ठंडक जो मार्च में सिर्फ सुबह-सुबह मिलती है।

चांदनी चौक के पास एक संकरी गली में मुड़ा तो एक अजीब खुशबू आई—मसालों, गीली मिट्टी और किसी पुराने लकड़ी के दरवाज़े की। मैंने सोचा था कि वहां एक पुरानी हवेली है, लेकिन पहुंचा तो पता चला कि वो तो एक छोटी सी मसाला मार्केट है जो अभी-अभी खुलनी शुरू हो रही थी। एक दुकानदार बोरियां खोल रहा था, और धूल के बादल हवा में तैर रहे थे। मैंने उससे पूछा, "भाई, इतनी जल्दी कैसे?" वो मुस्कुराया और बोला, "साहब, होली से पहले का टाइम है, मसालों का सीज़न चल रहा है।"

मैं आगे बढ़ा तो एक छोटी सी गलती हो गई—गूगल मैप पर भरोसा करके एक शॉर्टकट लिया, और खुद को एक बिल्कुल अलग ही इलाके में पाया। लेकिन वहां की दीवारों पर पुरानी हिंदी फिल्मों के पोस्टर लगे थे, फटे हुए लेकिन रंगीन। एक दीवार पर लिखा था, "यहां थूकना मना है"—और ठीक उसी के बगल में पान की लाल-लाल धारियां। इरोनी की भी एक हद होती है।

वापस लौटते हुए एक छोटे से पार्क में रुका जहां कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। उनकी गेंद मेरे पास आई, मैंने सोचा अपनी पुरानी बॉलिंग आजमाऊं—गेंद सीधे झाड़ी में गई। बच्चे हंसे, मैं भी हंस दिया। शायद कुछ चीज़ें छोड़ देनी चाहिए अतीत में।

घर पहुंचा तो सोचा, अगली बार बिना मैप के निकलूंगा। क्या पता, कौन सी नई गली मिल जाए?

#शहरकीसैर #दिल्लीदर्शन #सुबहकीचहलपहल #यात्रावृत्तांत #रोज़मर्रा

Comments

No comments yet. Be the first to comment!

Sign in to leave a comment.