आज सुबह कड़ाही में तेल थोड़ा ज़्यादा चढ़ा दिया। जीरा डाला तो वो भड़भड़ाया — एक ही पल में काला पड़ने को था। आँच तुरंत धीमी की, लेकिन जीरे का रंग वो हल्का भूरा नहीं रहा जो चाहिए था। रसोई में कुछ सेकंड को एक जली हुई खुशबू आई, फिर थम गई।
इस हफ्ते अमीनाबाद मंडी से कद्दू लाई थी। रमेश अंकल ने कहा था — "पीला मत लेना, सफ़ेद वाला लो, इस बार उसमें मिठास ज़्यादा है।" उनकी बात सुनी। घर आकर काटा तो अंदर से घना था, रेशे बहुत कम निकले — अंकल सही थे। मौसम के हिसाब से इस बार ठीक उतरा।
तड़के में जीरा-हींग के बाद प्याज़ सुनहरी होने तक भूनी, फिर कद्दू गया। खदबदाने की आवाज़ आई, तेज़ भाप उठी — और रसोई में एक हल्की, थोड़ी मिट्टी जैसी खुशबू फैल गई। यही खुशबू मुझे नानी की रसोई में खींच ले जाती है। वो सर्दियों में लौकी ऐसे ही पकाती थीं — बिना ढक्कन, धीमी आँच, कोई जल्दी नहीं। शायद कच्चे कद्दू और लौकी में कोई एक ही गंध होती है, जो पकते वक्त पहले बाहर आती है।
ढक्कन रखा, आँच और धीमी की। पंद्रह मिनट बाद कद्दू को उँगली से दबाया तो वो बिना प्रतिरोध के बैठ गया — एकदम मुलायम। नमक चखा तो लगा थोड़ा पीछे रह गया, हींग भी शायद कम पड़ी। अमचूर आधा चम्मच डाला तो उसने सब्ज़ी को खींचकर बाँध दिया — वरना कद्दू की मिठास बेलगाम हो जाती। नमक अंत में ऊपर से थोड़ा और छिड़का।
रोटी के साथ खाई। पहले कौर में कद्दू में एक हल्की चिकनाई थी — दाँतों के बीच दबाया तो बिना आवाज़ के, चुपचाप टूट गया। अफ़सोस एक ही — जला हुआ जीरा खाने के बाद भी ज़बान पर थोड़ी देर टिका रहा, हल्की कड़वाहट लिए। तड़के पर और ध्यान देना होगा। अगली बार।
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