आज सुबह रसोई में कदम रखते ही मुझे गुड़ की मीठी और गहरी खुशबू ने घेर लिया। मैंने सोचा था कि आज कुछ सादा सा बनाऊंगी, लेकिन अलमारी में रखा गुड़ का टुकड़ा देखकर मन बदल गया। बचपन में नानी जब भी चावल की खीर बनाती थीं, तो उसमें गुड़ डालकर एक अलग ही रंग ला देती थीं—वह हल्का भूरा रंग, वह महक, वह मिठास जो चीनी में कभी नहीं मिलती।
मैंने चावल को धोकर दूध में उबालना शुरू किया। पहले तो मुझे लगा कि आंच ज़रा तेज़ है, और दूध उफन गया। जल्दी से मैंने गैस धीमी की और एक बड़ा चम्मच लेकर चलाना शुरू किया। इस छोटी सी गलती ने मुझे सिखाया कि धैर्य रखना कितना ज़रूरी है—खासकर जब आप किसी चीज़ को उसकी असली बनावट तक पहुंचाना चाहते हों।
जब चावल नरम हो गए, तो मैंने गुड़ को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर धीरे-धीरे मिलाया। मिश्रण का रंग बदलने लगा—पहले हल्का क्रीम, फिर सुनहरा, और अंत में गहरा अंबर। बर्तन से उठती भाप में इलायची और केसर की हल्की सी सुगंध घुली थी। मैंने एक चुटकी केसर के धागे भी डाले, जो दूध में तैरते हुए अपनी पीली रंगत छोड़ रहे थे।