आज सुबह देर तक कड़ाही में पानी खदबदाता रहा — मैंने गैस धीमी नहीं की, बस वैसे ही छोड़ दिया और चाय पीती रही। बाहर से बारिश की वो बची-खुची नमी अभी भी हवा में है, जो दरवाज़ा खोलते ही अंदर आ जाती है। आज सोचा था दाल-चावल बना लूँगी, लेकिन मंडी से लाई हुई परवल अभी भी रखी थी तो पहले वही।
मंगलवार को अंकल के यहाँ से परवल ली थी — इस बार की परवल थोड़ी मोटी थी, जो मुझे कम पसंद है क्योंकि बीच में गुठली ज़्यादा होती है। अंकल बोले, "भाभीजी, ये देर की फ़सल है, तीन-चार दिन में ख़त्म हो जाएगी।" मौसमी चीज़ है, तो मैंने ले ली। घर आकर छोटे-छोटे काटे, बीज निकाले।
तड़के में सरसों का तेल ज़्यादा गरम हो गया — मेरी गलती। राई छनकी, फिर एक पल के लिए जल जाती, इससे पहले ही हींग और कटा अदरक डाला। उस हड़बड़ी में हींग कम पड़ गई। परवल अंदर डाली, कुछ देर ढकने पर मुलायम हो गई, पर जो हल्की कड़वाहट हींग से जाती है वो नहीं गई। नमक भी थोड़ा पीछे रह गया।