आज सुबह बाज़ार से ताज़ी हरी धनिया की खुशबू लेकर लौटी। पत्तियाँ इतनी हरी थीं कि लगा जैसे बारिश के बाद की घास हो। जड़ों में अभी भी मिट्टी लगी थी, और मैंने सोचा कि यही तो असली ताज़गी की निशानी है।
दोपहर में गोभी के पराठे बनाने का मन हुआ। आटा गूंधते वक्त याद आया कि दादी हमेशा कहती थीं, "आटे में प्यार मिलाओ, तभी पराठे फूलेंगे।" पहले मुझे यह बात अजीब लगती थी, लेकिन अब समझ आता है। जब तुम धीरज से, ध्यान से कुछ बनाते हो, तो वो खाने में भी महसूस होता है।
गोभी कद्दूकस करते समय एक छोटी सी गलती हुई। मैंने हरी मिर्च ज़्यादा डाल दी। पहला पराठा तवे पर रखा तो उसकी तीखी भाप ने आँखें भर दीं। सोचा, अब क्या करूँ? फिर याद आया कि दही के साथ परोसने से संतुलन बन जाएगा। और सच में, ठंडे दही की क्रीमी मिठास ने तीखेपन को बिल्कुल सही कर दिया।