आज सुबह मैंने देसी घी की खुशबू से आंखें खोलीं। रसोई से आ रही थी वो मीठी सुगंध, जैसे बचपन में दादी की रसोई से आती थी। मैंने सोचा, क्यों न आज कुछ पारंपरिक बनाया जाए। मन में आया कि गाजर का हलवा बनाऊं, लेकिन थोड़ा अलग तरीके से।
बाज़ार से ताज़ी लाल गाजरें लाई थी कल। उनका रंग देखकर ही मन खुश हो गया। कद्दूकस करते समय वह कुरकुरी आवाज़, उंगलियों पर गाजर का रस, और वह मीठी मिट्टी जैसी महक—सब कुछ बहुत खास लग रहा था। मैंने सोचा था कि चीनी कम डालूंगी, लेकिन गलती से पहली बार में ज़्यादा डाल दी। फिर क्या था, मुझे दूध और गाजर थोड़ी और मिलानी पड़ी। इससे मुझे एहसास हुआ कि संतुलन ही असली कला है।
कड़ाही में घी पिघलाया, फिर गाजर डाली। धीमी आंच पर, धैर्य के साथ। हर बार जब मैं हलवा बनाती हूं, मुझे अपनी दादी याद आती हैं। वे कहती थीं, "जल्दी में बना खाना, प्यार से महरूम होता है।" आज उनकी बात समझ आई। गाजर धीरे-धीरे नरम हो रही थी, दूध सोख रही थी, और घी का वह सुनहरा रंग चारों ओर फैल रहा था।
इलायची कूटते समय मुझे एक पुरानी कहावत याद आई: "खाना सिर्फ पेट नहीं, दिल को भी भरता है।" मैंने इलायची के दाने, थोड़े बादाम और काजू काटे। जब हलवा तैयार हुआ, तो उसकी खुशबू पूरे घर में फैल गई। पहला कौर मुंह में रखा—नरम, मीठा, घी की चिकनाई और इलायची की हल्की तीखी महक। बिल्कुल वैसा ही जैसा बचपन में दादी बनाती थीं, बस थोड़ा आधुनिक।
शाम को पड़ोस की आंटी आईं। उन्होंने कहा, "अरे, यह तो बिल्कुल असली हलवा है! तुमने कैसे बनाया?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "बस प्यार और धैर्य से।" वे हंसीं और बोलीं, "आजकल की लड़कियां भी अच्छा बनाती हैं।" उनकी बात सुनकर अच्छा लगा।
आज मैंने सीखा कि:
- सही सामग्री चुनना ज़रूरी है
- धीमी आंच से स्वाद बेहतर आता है
- गलतियां भी सीखने का मौका देती हैं
- पुरानी यादें नई रसोई में भी ज़िंदा रहती हैं
अब मैं अगली बार केसर भी मिलाने की सोच रही हूं। देखती हूं क्या होता है। खाना बनाना सिर्फ एक काम नहीं, यह एक यात्रा है—स्वाद की, यादों की, और खुद को जानने की।
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