आज सुबह रसोई में कदम रखते ही मुझे गुड़ की मीठी और गहरी खुशबू ने घेर लिया। मैंने सोचा था कि आज कुछ सादा सा बनाऊंगी, लेकिन अलमारी में रखा गुड़ का टुकड़ा देखकर मन बदल गया। बचपन में नानी जब भी चावल की खीर बनाती थीं, तो उसमें गुड़ डालकर एक अलग ही रंग ला देती थीं—वह हल्का भूरा रंग, वह महक, वह मिठास जो चीनी में कभी नहीं मिलती।
मैंने चावल को धोकर दूध में उबालना शुरू किया। पहले तो मुझे लगा कि आंच ज़रा तेज़ है, और दूध उफन गया। जल्दी से मैंने गैस धीमी की और एक बड़ा चम्मच लेकर चलाना शुरू किया। इस छोटी सी गलती ने मुझे सिखाया कि धैर्य रखना कितना ज़रूरी है—खासकर जब आप किसी चीज़ को उसकी असली बनावट तक पहुंचाना चाहते हों।
जब चावल नरम हो गए, तो मैंने गुड़ को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर धीरे-धीरे मिलाया। मिश्रण का रंग बदलने लगा—पहले हल्का क्रीम, फिर सुनहरा, और अंत में गहरा अंबर। बर्तन से उठती भाप में इलायची और केसर की हल्की सी सुगंध घुली थी। मैंने एक चुटकी केसर के धागे भी डाले, जो दूध में तैरते हुए अपनी पीली रंगत छोड़ रहे थे।
एक छोटा सा चम्मच लेकर मैंने स्वाद चखा। पहला एहसास था मुलायम चावल का, फिर गुड़ की मिठास ने जीभ को छुआ, और आखिर में इलायची की हल्की सी तीखी खुशबू ने सबकुछ बांध दिया। अफ़्टरटेस्ट में एक गरमाहट थी, जैसे कोई पुरानी याद दिल को छू गई हो।
मैंने खीर को ठंडा होने के लिए रखा और सोचने लगी—कैसे एक सामान्य सी चीज़ भी अगर थोड़े से ध्यान और प्यार से बनाई जाए, तो वह किसी ख़ास पल में बदल जाती है। नानी कहती थीं, "खाना सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, दिल भरने के लिए भी बनता है।" आज उनकी यह बात मुझे फिर से याद आई।
सामग्री (छोटी सी सूची):
- आधा कप चावल
- दो कप दूध
- एक छोटा टुकड़ा गुड़
- इलायची और केसर
शाम को मैंने इसे अपने छोटे भाई के साथ बांटा। उसने पहला चम्मच लिया और बोला, "यह तो नानी वाली खीर जैसी लग रही है।" मुस्कुराते हुए मैंने कहा, "हां, शायद उनकी कोई रेसिपी मेरे हाथों में आ गई है।"
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