आज सुबह जब मैंने रसोई की खिड़की खोली, तो बाहर से आ रही ताज़ी धनिये की महक ने मुझे बचपन की याद दिला दी। पड़ोस की आंटी अपनी छत पर हरी धनिया काट रही थीं, और वह सुगंध हवा में तैर रही थी।
मैंने आज गाजर का हलवा बनाने का मन बनाया। पर एक छोटी सी गलती हो गई - दूध में गाजर डालते समय आंच थोड़ी तेज़ रह गई, और तली में हल्का सा जल गया। पर इससे मुझे एक नई सीख मिली: धीमी आंच और धैर्य ही मिठाई की असली कुंजी है।
गाजर कद्दूकस करते समय उनका चमकीला नारंगी रंग देखकर मन खुश हो गया। देसी घी में भूनते समय जो खुशबू उठी, वह पूरे घर में फैल गई। धीरे-धीरे गाजर नरम हुई, दूध का रंग गुलाबी होने लगा, और इलायची के दाने अपना जादू बिखेरने लगे।