आज सुबह कड़ाही में तेल गरम होते वक्त जो धुआँ उठा, उसमें सरसों के तेल की जानी-पहचानी गंध थी — थोड़ी...
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आज सुबह कड़ाही में तेल गरम होते वक्त जो धुआँ उठा, उसमें सरसों के तेल की जानी-पहचानी गंध थी — थोड़ी...
आज सुबह देर तक कड़ाही में पानी खदबदाता रहा — मैंने गैस धीमी नहीं की, बस वैसे ही छोड़ दिया और चाय...
कड़ाही में जीरा डाला तो छनकने की जगह धुआँ उठा — तेल ज़्यादा गरम हो गया था। जल्दी से आँच कम की, पर...
कड़ाही में तेल की लकीर अभी भी थरथरा रही थी जब मैंने जीरा डाला — वो छनकार, फिर एक पल की चुप्पी, फिर...
Most of us have felt it: you finally sit down to rest, and within minutes you're scrolling,...
आज सुबह रसोई में एक अजीब सी खामोशी थी। खिड़की से आती धूप की किरणें मसाले के डिब्बों पर पड़ रही थीं, और हल्दी का पीला रंग चमक रहा था जैसे छोटे सूरज हों।
मैंने सोचा था कि आज कुछ सरल बनाऊंगी - बस दाल और चावल। लेकिन जब मैंने तड़के के लिए जीरा गरम तेल में डाला, तो वो सुनहरी-भूरा होने के बजाय काला पड़ने लगा। मैं एक पल के लिए भटक गई थी, फोन पर कोई संदेश देख रही थी। अरे नहीं। मुझे याद आया कि अम्मा हमेशा कहती थीं, "रसोई में जब तड़का लगाओ, तो बस वहीं रहो। वो इंतज़ार नहीं करता।"
मैंने फिर से शुरू किया। इस बार मैं चौकन्नी थी। जीरे की वो खुशबू - तीखी, गर्म, जो नाक से सीधे दिल तक पहुँचती है - फैलने लगी। मैंने कटी हुई प्याज़ डाली और उसे धीरे-धीरे भूनने दिया। प्याज़ का रंग बदलते देखना एक ध्यान जैसा है - सफ़ेद से पारदर्शी, फिर सुनहरा, फिर गहरा करामेली।
दाल पकते-पकते एक याद आ गई। मैं शायद आठ साल की रही होऊंगी, नानी के गाँव में। वहाँ चूल्हे पर दाल पकती थी, और धुआं रसोई की छत तक जाता था। नानी कहती थीं कि धुएं में पकी दाल का स्वाद अलग होता है - मिट्टी और आग का मिला-जुला। आज की गैस की दाल में वो बात नहीं, पर स्वाद फिर भी घर जैसा लगा।
शाम को पड़ोस की रीमा आई। उसने पूछा, "क्या बना रही हो? खुशबू तो बहुत अच्छी आ रही है।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "बस साधी दाल-चावल, लेकिन आज मैंने एक गलती से सीखा - तड़का माँगता है इज़्ज़त।"
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