आज सुबह कड़ाही में तेल गरम होते वक्त जो धुआँ उठा, उसमें सरसों के तेल की जानी-पहचानी गंध थी — थोड़ी...
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आज सुबह कड़ाही में तेल गरम होते वक्त जो धुआँ उठा, उसमें सरसों के तेल की जानी-पहचानी गंध थी — थोड़ी...
आज सुबह देर तक कड़ाही में पानी खदबदाता रहा — मैंने गैस धीमी नहीं की, बस वैसे ही छोड़ दिया और चाय...
कड़ाही में जीरा डाला तो छनकने की जगह धुआँ उठा — तेल ज़्यादा गरम हो गया था। जल्दी से आँच कम की, पर...
कड़ाही में तेल की लकीर अभी भी थरथरा रही थी जब मैंने जीरा डाला — वो छनकार, फिर एक पल की चुप्पी, फिर...
Most of us have felt it: you finally sit down to rest, and within minutes you're scrolling,...
आज सुबह किचन में घुसते ही पुदीने की ताज़ी खुशबू ने मुझे रोक लिया। कल शाम बाज़ार से लाई गई हरी पत्तियां अभी भी नमी से भरी थीं। मैंने सोचा था परांठे बनाऊंगी, लेकिन इस महक ने दिमाग बदल दिया। पुदीने की चटनी के साथ आलू की टिक्की—बस यही चाहिए था आज।
आलू उबालते समय मुझसे एक गलती हो गई। नमक डालना भूल गई पानी में। जब छीलकर मसाला मिलाया तो एहसास हुआ कि स्वाद फीका है। तभी याद आया कि अम्मा हमेशा कहती थीं—"आलू को पकाते समय ही नमक दो, बाद में वो अंदर तक नहीं जाता।" आज उनकी बात का मतलब समझ आया। मैंने थोड़ा ज़्यादा नमक और काली मिर्च डालकर संभाला।
टिक्की को तवे पर सेंकते समय वो सुनहरा रंग देखकर तसल्ली हुई। किनारे करारे हो रहे थे, बीच में नरम। पुदीने की चटनी में नींबू का रस, ज़ीरा, और हरी मिर्च पीसी। चटनी का खट्टा-तीखा स्वाद टिक्की की मिठास को बैलेंस कर रहा था।
पहला कौर मुंह में रखा तो बाहर की करारी परत अंदर की मुलायम भराई के साथ घुली। पुदीने की ठंडक ने सब कुछ जीवंत कर दिया। खाते-खाते मुझे बचपन की वो शाम याद आई जब दादी मंदिर से लौटकर ऐसी ही टिक्कियां बनाती थीं। उनके हाथ की चटनी में कुछ जादू था—शायद प्यार था वो।
शाम को पड़ोस की रीमा आई तो बोली, "वाह, क्या खुशबू है!" मैंने उसे भी खिलाया। उसने कहा, "तुम्हारी चटनी में धनिया ज़्यादा है क्या?" मैंने कहा, "नहीं, बस पुदीना और ज़ीरा।" कभी-कभी सादगी में ही असली स्वाद छिपा होता है।
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