आज सुबह बाज़ार से ताज़ी हरी धनिया की खुशबू लेकर लौटी। पत्तियाँ इतनी हरी थीं कि लगा जैसे बारिश के बाद की घास हो। जड़ों में अभी भी मिट्टी लगी थी, और मैंने सोचा कि यही तो असली ताज़गी की निशानी है।
दोपहर में गोभी के पराठे बनाने का मन हुआ। आटा गूंधते वक्त याद आया कि दादी हमेशा कहती थीं, "आटे में प्यार मिलाओ, तभी पराठे फूलेंगे।" पहले मुझे यह बात अजीब लगती थी, लेकिन अब समझ आता है। जब तुम धीरज से, ध्यान से कुछ बनाते हो, तो वो खाने में भी महसूस होता है।
गोभी कद्दूकस करते समय एक छोटी सी गलती हुई। मैंने हरी मिर्च ज़्यादा डाल दी। पहला पराठा तवे पर रखा तो उसकी तीखी भाप ने आँखें भर दीं। सोचा, अब क्या करूँ? फिर याद आया कि दही के साथ परोसने से संतुलन बन जाएगा। और सच में, ठंडे दही की क्रीमी मिठास ने तीखेपन को बिल्कुल सही कर दिया।
तवे पर पराठा पकते समय वो सुनहरे भूरे धब्बे बनने लगे। घी की खुशबू पूरे घर में फैल गई। पहला कौर लिया तो बाहर की परत कुरकुरी थी, अंदर की भराई नरम और गरमागरम। यही तो जादू है खाने का, मैंने सोचा।
पड़ोस की चाची आईं और बोलीं, "आज तो कुछ खास बना रही हो, खुशबू यहाँ तक आ रही है!" मैंने उन्हें एक गरम पराठा दिया। उन्होंने कहा, "बिल्कुल तुम्हारी दादी जैसा बनाती हो।"
शाम को उस धनिया को चटनी में पीसा। हरा रंग, तीखी खुशबू, और नींबू की खटास—तीनों मिलकर एक जीवंत स्वाद बने। इस चटनी के साथ बचे हुए पराठे खाए और सोचा कि खाना सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, यादों को ज़िंदा रखने के लिए भी है।
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