आज सुबह जब मैं बाज़ार से लौटी, तो मेरे थैले में ताज़ी पालक की गुच्छियां और लाल टमाटर थे। धूप की हल्की गर्मी अभी भी सब्ज़ियों पर थी। मैंने सोचा था कि आज पालक पनीर बनाऊंगी, लेकिन जब मैंने पनीर की डिब्बी खोली तो पता चला कि वह कल ही ख़त्म हो गया था। छोटी सी गलती, पर मैंने सोचा - क्यों न आज कुछ अलग करूं?
पालक को धोते समय पत्तों के बीच मिट्टी की महक आई। यह महक मुझे बचपन की याद दिला गई, जब मैं दादी के साथ उनके बगीचे में खड़ी होती थी। वह कहती थीं, "पालक को तीन बार धोओ, तभी असली स्वाद आता है।" मैंने वैसा ही किया। पानी की धार में हरे पत्ते चमक उठे।
मैंने फैसला किया कि आज सिर्फ़ पालक की सब्ज़ी बनाऊंगी - साधारण, मगर स्वादिष्ट। प्याज़, लहसुन, अदरक का तड़का लगाया। रसोई में तड़-तड़ की आवाज़ गूंजी। फिर टमाटर डाले और मसाले मिलाए। जब पालक की प्यूरी कढ़ाई में पड़ी, तो गहरी हरी लहर की तरह फैल गई।
खाते समय मुझे लगा कि कभी-कभी गलतियां भी रास्ता दिखाती हैं। पनीर के बिना भी यह सब्ज़ी पूरी थी - हल्की, ताज़ी, और ज़मीन की महक से भरी। आख़िरी कौर के साथ एक तृप्ति का अहसास आया। शायद सादगी में ही असली स्वाद छुपा होता है।
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