आज सुबह रसोई में घुसते ही पुराने मसालों की वह गहरी खुशबू आई जो दादी के घर की याद दिलाती है। मैंने सोचा था कि आज कुछ सादा बनाऊंगी, बस दाल-चावल, लेकिन हाथ अपने आप तड़के के डब्बे की तरफ बढ़ गए।
जीरा तड़कते ही पूरा किचन महक उठा। मैंने हींग की एक चुटकी डाली और वो क्षण—जब गरम तेल में हींग फुफकारती है—हर बार मुझे हैरान कर देता है। कितनी थोड़ी सी चीज़ से कितना बदलाव आ जाता है। मैंने टमाटर काटे, और तभी याद आया कि नमक डालना भूल गई थी। दाल में नमक बाद में डालो तो वो उतनी नरम नहीं होती—यह सबक मैंने पिछली बार सीखा था, पर आज फिर से वही गलती।
दाल उबलते हुए देखना एक ध्यान जैसा है। पहले सफेद झाग उठता है, फिर धीरे-धीरे रंग गहरा होता जाता है। मैंने चम्मच से चखा—अरहर की वो हल्की मिठास, हल्दी का कड़वापन, और तड़के की तीखी गरमाई। कुछ कमी लग रही थी, तो मैंने नींबू निचोड़ा। अचानक सब कुछ जगमगा उठा।
मुझे याद आया कि बचपन में दादी कहती थीं, "खाने में जान तो आखिरी छौंक से आती है।" वो अपनी दाल में आखिर में घी डालती थीं, बस एक चम्मच, और खुशबू ऐसी उठती थी कि पड़ोसी भी पूछने आ जाते थे।
आज मैंने भी वैसा ही किया। एक चम्मच देसी घी, तड़कती करी पत्ती, और बस। दाल तैयार थी। गरम चावल के साथ परोसी, और पहले कौर के साथ ही मन तृप्त हो गया। कभी-कभी सबसे सादा खाना ही सबसे संतोषजनक होता है।
बचा हुआ तड़का मैंने एक छोटे डब्बे में रख लिया—कल की सब्जी के लिए।
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