आज सुबह जब मैंने बाज़ार से ताज़ा धनिया और पुदीना लाया, तो उनकी खुशबू ने रसोई को भर दिया। हरी पत्तियों पर अभी भी पानी की बूँदें चमक रही थीं। मैंने सोचा आज कुछ नया करूँ — पुदीने की चटनी में थोड़ा भुना जीरा और नींबू का रस मिलाऊँ।
चटनी पीसते समय मुझसे एक छोटी सी गलती हो गई। मैंने पहले नमक डाल दिया, जिससे पुदीना जल्दी पानी छोड़ने लगा। अम्मा हमेशा कहती थीं, "नमक सबसे आखिर में डालो, वरना सब्ज़ी की रंगत उड़ जाती है।" आज मुझे उनकी बात याद आई। फिर भी, स्वाद अच्छा था — तीखा, खट्टा, और थोड़ा धुआँदार जीरे के कारण।
दोपहर में जब मैंने ये चटनी आलू के पराठे के साथ परोसी, तो उसकी महक से मुझे बचपन की याद आ गई। नानी के घर में गर्मियों की छुट्टियों में हम बच्चे आँगन में बैठकर पुदीने की पत्तियाँ तोड़ते थे। वो कहतीं, "जो अपने हाथ से बनाए, वो दिल से खाओ।"
शाम को मैंने सोचा कि अगली बार नमक बाद में डालूँगी, और शायद थोड़ा गुड़ भी मिलाऊँगी — मीठे और चटपटे का संतुलन। छोटे प्रयोग ही तो हमें सिखाते हैं।
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