आज सुबह जब कड़ाही गरम हो रही थी, तेल से हल्की धुएँ की लकीर उठी — उसी से समझ आया कि आँच थोड़ी ज़्यादा हो गई। जीरा डाला तो वो झुनझुनाया नहीं, चटक गया। पहले ही पल में रंग बदल गया था। मैंने झटपट कड़ाही उठाकर गीले कपड़े पर रखी, थोड़ा तेल और डाला, फिर से शुरू किया।
आज टिंडे बनाए। बुधवार की मंडी से लाई थी — मंडी वाले छोटू ने कहा था, "दीदी, ये देसी हैं, छिलका पतला है, ज़्यादा नहीं छीलना।" सच में, अंदर से घी जैसे मुलायम निकले। मैंने प्याज़ नहीं डाला इस बार, बस अदरक और हरी मिर्च का लंबा टुकड़ा। सोचा था कि सूखी रहेगी, लेकिन टिंडे का अपना पानी इतना था कि मसाला उसी में पक गया।
धनिया देर से याद आया — सब्ज़ी लगभग तैयार थी जब मैंने डाला। उससे ताज़गी तो आई, लेकिन वो जो धनिया पहले डालने से मसाले में घुल जाती है, वो खुशबू इस बार नहीं उठी। अगली बार याद रखना है — धनिया पाउडर और हरा धनिया दोनों अलग-अलग वक़्त पर।
पहला कौर मुँह में गया तो टिंडा मुलायम था, लेकिन बाहर से थोड़ा कुरकुर — वो इसलिए कि आखिर में ढक्कन उठा दिया था। अफ़सोस नहीं हुआ। नमक ठीक था, हाँ, हींग थोड़ी पीछे रह गई। नानी जी हमेशा कहती थीं — "हींग कम हो तो टिंडा सपाट लगता है।" आज बिल्कुल वैसा ही लगा।
रोटी के साथ खाई, आम का अचार एक चम्मच। इस बार का अचार तेल छोड़ रहा है — मतलब ठीक से पका है। तीनों ने चुपचाप खाया, कोई टिप्पणी नहीं, खाना खत्म हो गया। यही काफ़ी है।
#घर_का_खाना #मौसमी_सब्ज़ी #रसोई_डायरी #लखनऊ_की_रसोई