आज जीरा जब तेल में गिरा, तो एक पल रसोई थम गई — वो छनन की आवाज़, फिर धुएँ जैसी खुशबू जो नाक तक पहुँचने से पहले ही बता देती है कि तड़का सही जगह है।
कल शुक्रवार की मंडी से करेला लाई थी — पतला, हरा, नुकीला। अमीनाबाद वाले अंकल ने खुद कहा था, "अभी का है, कड़वाहट ज़्यादा नहीं होगी।" नमक लगाकर आधा घंटा रखा, फिर निचोड़ा। हाथ थोड़ा ज़्यादा ज़ोर से चला — पानी के साथ थोड़ा स्वाद भी निकल गया, यह गलती थी।
प्याज़ सुनहरा होते-होते एक मिनट ज़्यादा हो गया, ध्यान नहीं रहा। उसी वजह से करेले में कड़वाहट के साथ प्याज़ की हल्की मिठास भी घुल गई। बुरी नहीं लगी, बस अनचाही थी।
पहला कौर लिया तो मुँह में पहले कुरकुर, फिर मुलायम। करेले का रेशा दाँतों के बीच टिकता है — उसमें अजवाइन का असर पीछे से खुलता है, धीरे। नमक इस बार ठीक उतरा, पर मिर्च एक चुटकी पीछे रह गई।
नानी के यहाँ करेला ज़्यादा तेल में बनता था, लगभग तला हुआ। वो कुरकुराहट अलग थी। मैंने कम तेल की आदत डाली है, पर वो बात अब नहीं आती — शायद वो तेल का स्वाद नहीं था, उस रसोई का था।
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